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रैगर जाति के लोकोउत्‍सव व व्रत


       वैसे तो दीपावली, रक्षा-बंधन, रामनवमी, दशहरा और होली के त्‍यौहार रैगर जाति के लोग बड़ी उमंग से मनाते हैं लेकिन कुछ ऐसे त्‍यौहार है जो रैगर जाति के लोगों के लिये विशेष रूप से महत्‍व रखते हैं हालांकि रैगर जाति के लोग जहां भी जाकर बस गये उस क्षेत्र के त्‍यौहारों को भी अपने जीवन में रमा लिये जैसे कि पंजाब में ''लौड़ी'' का त्‍यौहार आदि । रैगर जाति के कुछ महत्‍वपूर्ण व्रत और त्‍यौहार इस प्रकार है -


चैत्र माह के त्‍यौहार:

1. नवरात्रा: चैत्र सुदी एकम् से नवरात्रा प्रारम्‍भ हो जाता है । इस प्रकार यह चैत्र शुक्‍ल की प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक मनाया जाता है । प्रतिपदा के दिन घट-स्‍थापना एवं जौ बोने की क्रिया की जाती है । नवरात्रा में नौ दिन तक रैगर जाति के कई लोग मांस मदिरा का सेवन भी नहीं करते और सात्विक जीवन जीते हैं ।
2. दुर्गा अष्‍टमी: यह चैत्र मास की शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी को मनाया जाता है । इस दिन कुमारियां तथा सुहागने पार्वती जी की गोबर से निर्मित प्रतिमा का पूजन करती है । रैगर अष्‍टमी के दिन कढ़ाई का भोग लगाया करते थे अर्थात 'पूआ' और 'पड़ी' का खाना बनाया करते थे । कढ़ाई में बचे हुये तेल से लापसी बनाया करते थे । ये लोग मांसाहारी भोजन भी बनाया करते थे । इस दिन देवी की पूजा के लिये दीपक के सामने 'जागते' अर्थात् आग का अंगारे के उपर बकरे का कलेजा, पूआ, पूड़ी एवं लापसी तथा दारू का भोग लगाया करते थे । आग में बकरे के कलेजे को सेकने को 'सूले' कहा जाता था । आजकल यह प्रथा बिल्‍कुल बन्‍द हो गई है ।
3. रामनवमी: रैगर जाति मूलत: हिन्‍दू धर्म को मानने के कारण रामनवमी को एक महत्‍वपूर्ण मानती है । चैत्र शुक्‍ल को नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्‍न में कौशल्‍या माता से पुरूषोत्तम भगवान राम का जन्‍म हुआ था । वे इस दिन नयी बही प्रारम्‍भ करते हैं ।


बैसाख माह के त्‍यौहार:

4. शीतलाष्‍टमी अर्थात बसोड़ा: होली के आठवें दिन 'बसोड़ा' या 'बासेड़ा' का त्‍यौहार आता है । जिसका अर्थ है बासी भोजन । इस दिन पिछले दिन तैयार किये हुए भोजन का शीतला माता को भोग लगाकर ठण्‍डा भोजन ही किया जाता है । रैगर जाति में यह माता, चेचक, बोदरी आदि की देवी के रूप में ही पूजी जाती है ।
5. आखा तीज़ अर्थात् अक्षय तृतीया: इस दिन रैगर जाति के लोग अपने बच्‍चों का विवाह करते है । आखा तीज़ को बिना कोई मुहुर्त निकाले शुभ दिन माना जाता है । इस त्‍यौहार के दिन मारवाड़ क्षेत्र के रैगर जाति के लोग गेहूँ का खींज तैयार करते है और अतिथियों को भोजन के लिये आंमत्रित करते हैं ।


ज्‍येष्‍ठ माह के त्‍यौहार:

6. गंगा दशहरा: गंगा दशहरा का पर्व ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है । ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल दशमी को सोमवार तथा हस्‍त-नक्षत्र होन पर यह तिथि घोर पापों को नष्‍ट करने वाली मानी गई है । हस्‍त नक्षत्र में बुधवार के दिन गंगावतार हुआ था इसलिये रैगर जाति के लिये यह तिथि अधिक महत्‍वपूर्ण है । इस तिथि में स्‍नान, दान, तर्पण से दस पापों का नाश होता है इसलिये इसे दशहरा कहते हैं । इस दिन गंगा में स्‍नान का रैगर जाति के लिये विशेष महत्‍व है । गंगा स्‍नान से व्‍यक्ति के सारे पापों का नाश हो जाता है । इस दिन जल को वर्ष भर रखने पर भी सड़ता नहीं है । दिल्‍ली में रैगर जाति के लोग यमुना नदी में स्‍नान किया करते थे ।
       रैगर जाति के लोगों द्वारा गंगा की पूजा की जाती है इसलिये गंगा दशहरा के विषय में प्रचलित कथा को देखे तो यह पाते हैं कि प्राचीनकाल में अयोध्‍या में सगर नाम के राजा राज किया करते थे । उनके केशिनी तथा सुमति नामक दो रानियां थी । केशिनी से अंशुमान नामक पुत्र हुआ तथा सुमति के साठ हजार पुत्र थे । एक बार राजा सगर ने अश्‍वमेघ यज्ञ किया । यज्ञ की पूर्ति के लिये एक घोड़ा छोड़ा । इन्‍द्र यज्ञ को भंग करने हेतु घोड़े को चुराकर कपिल मुनिक के आश्रम में बांध आये । राजा ने यज्ञ के घोड़े को खोजने के लिये अपने साठ हजार पुत्रों को भेजा । घोड़े को खोजते-खोजते वे कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे तो उन्‍होंने यज्ञ के घोड़े को वहां बंधा पाया । उस समय कपिल मुनि तपस्‍या कर रहे थे । राज के पुत्रों ने कपिल मुनि को चोर-चोर कह कर पुकाना शुरू कर दिया । कपिल मुनि की तपस्‍या भंग हो गई । इस पर राजा के पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि में जलकर भस्‍म हो गये ।
       अंशुमान पिता की आज्ञा पाकर अपने भाइयों को खोजता हुआ जब मुनि के आश्रम पहुंचा तो महात्‍मा गरूड़ ने उसके भाईयों के भस्‍म होने का सारा वृतान्‍त सुनाया । गरूड़ जी ने अंशुमान को यह भी बताया कि यदि इनकी मुक्ति चाहते हो तो गंगा जी को स्‍वर्ग से धरती पर लाना होगा । इस समय अश्‍व को ले जाकर अपने पिता के यज्ञ को पूर्ण कराओ । इसके बाद गंगा को पृथ्‍वी पर लाने का कार्य करना । अंशुमान ने घोड़े सहित यज्ञ मंडम में पहुंचकर राजा सगर से सब वृतान्‍त कह सुनाया । महाराजा सगर की मृत्‍यु के पश्‍चात अंशुमान ने गंगा जी को पृथ्‍वी पर लाने के लिये तप किया परन्‍तु वह असफल रहे । इसके बाद उनके पुत्र दिलीप ने भी तपस्‍या की परन्‍तु वह भी असफल रहे ।
       अन्‍त में दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गंगा जी को पृथ्‍वी पर लाने के लिये गोकर्ण तीर्थ में जाकर कठोर तपस्‍या की । तपस्‍या करते-करते कई वर्ष बीत गये, तब ब्रह्मा जी पसन्‍न हुये तथा गंगा जी को पृथ्‍वी लोक पर ले जाने का वरदान दिया । अब समस्‍या यह थी कि ब्रह्मा जी ने तबाया कि भूलोक में भगवान शंकर के अतिरिक्‍त किसी में यह शक्ति नहीं है जो गंगा के वेग को संभाल सके इसलिये उचित यह है कि गंगा का वेग संभालने के लिये भगवान शिव से अनुग्रह किया जावे । महाराज भागीरथ एक अंगूठे पर खड़े होकर भगवान शंकर की आराधना करने लगे । उनकी कठोर तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर शिव जी गंगा को अपनी जटाओं में संभालने के लिये तैयार हो गये । गंगा जी जब देवलोक से पृथ्‍वी की ओर बढ़ी तो शिव जी ने गंगा जी की धारा को अपनी जटाओं में समेट लिया । कई वर्षों तक गंगा जी को जटाओं से बाहर निकालने का पथ न मिल सका ।
       भागीरथी ने पुन: अननय-विनय करने पर शिव जी गंगा को अपनी जटाओं से मुक्‍त करने के लिये तैयार हुये । इस प्रकार शिव की जटाओं से छूटकर गंगा जी हिमालय की घाटियों में कलकल निनाद कर के मैदान की ओर बढ़ी । जिस रास्‍ते से गंगा जी जा रही थी उसी मार्ग में ऋषि जंहु का आश्रम था । तपस्‍या में विघ्‍न समझकर वे गंगा जी को पी गये । भगीरथी के प्रार्थना करने पर उन्‍हें पुन: जांघ से निकाल दिया । तभी से गंगा जंहु पुत्री या जाह्मवी कहलाई । इस प्रकार अनेक स्‍थलों को पार करती हुई जाह्मवी ने कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर सगर के साठ हजार पुत्रों के अमर होने का वर दिया तथा घोषित किया कि तुम्‍हारे नाम पर गंगा जी का नाम भागीरथी होगा । अब तुम जाकर अयोध्‍या का राज संभालो । ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अन्‍तर्यान हो गये ।
7. निर्जला ग्‍यारस: ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को निर्जला ग्‍यारस या एकादशी कहते हैं । इस व्रत में पानी पीना भी वर्जित है इसलिये इसे निर्जला एकादशी कहते हैं । वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में से ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल एकादशी सर्वोत्तम मानी गई है । इसका व्रत रखने से सारी एकादशीयों के व्रतों का फल मिल जाता है । रैगर समाज के लोग आम तौर से इस त्‍यौहार को नहीं मनाते परन्‍तु उनके लिये यह अबुझ ब्‍याह का सावा है ।


आषाढ माह के पर्व :

8. देव सौनी ग्‍यारस अर्थात देवशयनी एकादशी: आषाढ शुक्‍ल एकादशी को देव सौनी ग्‍यारस अर्थात देवशयनी एकादशी कहते हैं । इस दिन देव सौ जाते है । पुराणों में उल्‍लेख आया है कि इस दिन भगवान विष्‍णु चार मास तक पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की एकादशी का प्रस्‍थान करते हैं । इसी कारण इसे देवशयनी एकादशी तथा कार्तिक मास वाली एकादशी को देव उठनी ग्‍यारस अर्थात देवोत्‍थानी एकादशी कहते है । आषाढ मास से कार्तिक मास तक के समय को चातुर्मास्‍य कहते हैं । इन चार महीनों में भगवान क्षीर सागर की अनन्‍त शैया पर शयन करते है । इसीलिये रैगर जाति के लोग इन चार महिनों में विवाह, नये घर में ग्रह प्रवेश आदि का कोई शुभ कार्य नहीं करते हैं । इन‍ दिनों में साधू लोग एक ही स्‍थान पर रह कर तपस्‍या करते हैं ।
9. गुरू पूण्‍यू अर्थात गुरू पूर्णिमा: आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं । प्राचीनकाल में विद्यार्थी गुरूकुलों में शिक्षा प्राप्‍त करने जाते थे । छात्र इस दिन श्रृधा भाव से प्रेरित अपने गुरू का पूजनकर के अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देकर गुरू जी को प्रसन्‍न करते थे । रैगर जाति के लोग इस त्‍यौहार को अपना नहीं मानते थे क्‍योंकि रैगर समाज के लोगों का पहले के समय में कोई गुरू बनना पसंद नहीं करता था, लेकिन आज कल रैगर बंधुओं के अपने समाज के ही गुरूओं तथा अन्‍य समाज के गुरूओं से गुरू शिष्‍य का संबंध बन गया है ओर अब इस त्‍यौहार को हर्सोउल्‍लास के साथ मनाया जाता है ।


श्रावण माह के पर्व:

10. शिवजी के व्रत: सावन माह के समस्‍त सोमवारों को यह व्रत रखा जाता है । इस व्रत में शिव, पार्वती, गणेश तथा नन्‍दी की पूजा की जाती है । पूजन के बाद केवल एक बार भोजन करने का विधान है ।
11. श्रावण शुक्‍ल तीज अर्थात तीजों का त्‍यौहार: श्रृंगार की भावनाओं का यह त्‍यौहार सावन-भादों की मनोरम ऋतु शुरू होने के समय श्रावण मास के शुक्‍ल पक्ष की तीज को पड़ता है । इस समय सावन की फुहारों से धरती की तपन दूर हो चुकी होती है और नये अंकुरण से धरती हरियाली चादर ओढ़ लेती है । यह त्‍यौहार नीरस ग्रीष्‍म ऋतु के बाद आने वाले त्‍यौहारों की कड़ी का पहला त्‍यौहार है । इस‍लीये कहा गया है- 'तीज त्‍यौहार बावड़ी' ले डूबी गणगौर' अर्थात तीज त्‍यौहारों को लेकर आती है, जिनको गणगौर अपने साथ वापिस ले जाती है ।
       इस त्‍यौहार के दिन रैगर जाति की महिलायें हाथों में मेहंदी रचाये, आभूषण पहने बड़े उत्‍साह से पार्वती का प्रतीक 'तीज' की पूजा करती है और अपने सुहाग की मंगलकामना करती है । पहले इस दिन को बालक-बालिकायें और महिलायें झुला झुलाती थी परन्‍तु अब शहरीकरण के कारण यह सम्‍भव नहीं होता है । कहते हैं कि इस दिन गौरा विरहाग्नि में तप कर शिव से मिली थी ।
12. गणगौर: राजस्‍थान में रैगर जाति के लोगों के लिये यह पर्व बसंती पर्वों की समापन वेला का पर्व होता है । पहले दिल्‍ली में भी इस पर्व को बड़े ही उत्‍साह के साथ मनाया जाता था जिसका मूल कारण यह था कि दिल्‍ली रैगर जाति के लोग राजस्‍थान से ही आकर बसे थे । अविवाहित युवतियां मनोवांछित वर प्राप्‍त करने के लिये तथा सौभाग्‍यवती महिलायें अपने सुहाग की दीर्धायु के लिये गणगौर पूज करती है । गणगौर शब्‍द में 'गण' महादेव और 'गौर' गौरी पार्वती का प्रतीक है ।
13 सिंधारा: सावन में स्‍वादिष्‍ट पकवान जैसे गंजिया, घेवर, फैनी आदि बेटियों को सिंधारा भेजा जाता है । बायना छूकर सासू जी को भेजा या दिया जाता है । राजस्‍थान में रैगर जाति में बहिन बेटियों को घर पर बुलाकर मेहन्‍दी रचवाने का भी रिवाज़ है ।
14. राखी अर्थात रक्षा बंधन: यह त्‍यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । यह त्‍यौहार मुख्‍य रूप से भाई बहन के स्‍नेह का त्‍यौहार है । इस दिन बहन-भाई के हाथ पर राखी बांधती है और माथे पर तिलक लगाती है । भाई प्रतिज्ञा करता है कि यथाशक्ति में अपनी बहन की रक्षा करूंगा ।
       एक बार भगवान कृष्‍ण के हाथ में चोट लगने से रक्‍त बहने लगा था तो द्रोपदी ने अपनी साड़ी फाड़ कर उनके हाथ में बांध दी थी । इसी बंधन से ऋणी श्रीकृष्‍ण ने दु:शासन द्वारा चीर हरण के समय द्रोपदी की लाज बचायी थी । मध्‍यकालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है जिसमें चित्तौड़ की रानी कर्मवती ने दिल्‍ली के मुगल बादशाह हुमायूं के पास राखी भेजकर अपना भाई बनाया । हुमायूं ने राखी की इज्‍जत की और उसके सम्‍मान की रक्षा के लिये गुजरात के बादशाह से युद्ध किया । रैगर जाति में राखी का त्‍यौहार बड़े ही हर्षोउल्‍लास से मनाया जाता है ।


भाद्रपद अर्थात भाद्रवा के पर्व:

15. श्री कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी: भाद्रपद कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल में वासुदेव जी की पत्‍नी देवी देवकी के गर्भ से सोलह कलाओं से युक्‍त भगवान श्री कृष्‍ण का जन्‍म हुआ था । इसी तिथि को रोहिणी नक्षत्र का विशेष माहात्‍म्‍य है । इस दिन देश के समस्‍त मन्दिरों में श्रृंगार किया जाता है । कृष्‍णावतार के उपलक्ष में झांकियां सजायी जाती है । रैगर जाति में स्‍त्री-पुरूष रात के बारह बजे तक व्रत रखते हैं । रात का बारह बजे शंख तथा घंटों की आवाज से श्रीकृष्‍ण के जन्‍म की खबर चारों दिशाओं में गूंज उठती है । भगवान कृष्‍ण की आरती उतारी जाती है और प्रसाद वितरण किया जाता है । प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही रैगर जाति के लोग अपना व्रत खोलते हैं ।
16. गणेश चतुर्थी: भाद्रपद माह की शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है । इस दिन रैगर समाज के कई लोग गणेश जी की पूजा करते हैं ।
17. रामदेव जी की जात: रैगर जाति के लोग रामदेव जी की पूजा करते हैं । भादुवा सुदी दशमी को रामदेव जी की जात लगाते हैं । राजस्‍थान में जैसलमेर जिले के पोकरण कस्‍बे के निकट रामदेव जी का मेला भरता है जिसमें रैगर जाति के लोग पूजा करने के लिये जाते हैं । रामदेव जी को अपने देवता के रूप में भी स्‍वीकार करते हैं । यदि मौहल्‍ले में रामदेव जी का कोई मन्दिर होता है तो वे इस दिन वहां जाकर पूजा करते हैं । रामदेव जी को जल, मौली, रोली, चावल, फुल से पूजा करते हैं और चूरमा व नारियल दक्षिणा में देते हैं । उसके बाद रामदेव जी की मूर्ति के आगे सिर झुकाते हैं ।
आश्विन अर्थात आस्‍योज माह के पर्व:
18. श्राद्ध: भाद्रपद की पूर्णिमा एवं आश्विन मास के कृष्‍ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस तक समय 'पितृ पक्ष' कहलाता है । रैगर समाज द्वारा इस पक्ष में मृतक पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है । श्राद्ध के भोजन में खीर पूड़ी होती है । पितृ पक्ष में पितरों की मरण तिथि को ही उसका श्राद्ध किया जाता है ।
19. न्‍योयत्रा अर्थात नवरात्र आरम्‍भ: आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपक्ष से नवमी तक को नवरात्र कहते हैं और रैगर समाज बखूबी निभाता है ।
20. दुर्गा अष्‍टमी: यह पर्व दिल्‍ली व पंजाब के रैगर समाज में अधिक प्रचलित है । आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी को दुर्गा अष्‍टमी के रूप में रैगर मनाते हैं । इस दिन दुर्गा की पूजा का विधान है । भगवती को उबले हुये चनै, हलवा, पूड़ी, खीर आदि का भोग लगाया जाता है ।
21. दशहरा अर्थात विजया दशमी: यह आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है । इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर विजया दशमी कहते हैं । इस दिन भगवान रामचन्‍द्र जी ने लंका पर विजय प्राप्‍त की थी इसलिये भी पर्व को विजया दशमी कहा जाता है । ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्‍ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक काल होता है । यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है । क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व माना जाता है । रैगर जाति एक क्षत्रिय जाति रही है इसलिये रैगर समाज के लिये यह पर्व बहुत महत्त्वपूर्ण पर्व है ।


कार्तिक महा के पर्व

22. करवा चौथ: कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है । यह रैगर जाति की महिलाओं का मुख्‍य त्‍यौहार है । सुहागिन स्त्रियां अपेन पति की दीर्घायु के लिये यह व्रत करती है । इस दिन निर्जल व्रत किया जाता है । चन्‍द्रमा को देखकर अर्घ्‍य देती है फिर वे भोजन करते हैं ।
23. धनतेरस अर्थात धन त्रयोदशी: कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी धन त्रयोदशी के रूप में मनाई जाती है । यह दीपावली के आने की शुभ सूचना है । इस दिन धन्‍वंतरी के पूजन का विधान है । कहते हैं कि इस दिन धन्‍वंतरी वैद्य संमुद्र से अमृत कलश लेकर आये थे इसलिये धनतेरस को 'धन्‍वंतरी जयंती' भी कहते हैं । रैगर जाति के लोग इस दिन घर के टूटे-फूटे पुराने बर्तनों के बदले नये बर्तन खरीदते हैं । इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्‍यधिक शुभ माना जाता है ।
25. दीपावली: कार्तिक मास की अमावस्‍या को दीपावली का पर्व रैगर जाति के लोगों द्वारा मनाया जाता है । इस दिन लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न करने के लिये पहले से घरों की पुताई करके साफ सुथरा कर लिया जाता है । रैगर जाति में यह मान्‍यता है कि कार्तिक अमावस्‍या को भगवान श्री रामचन्‍द्र जी चौदह वर्ष का वनवास काटकर रावण को मार कर अयाध्‍या लौटे थे । अयोध्‍यावासियों ने श्री रामचन्‍द्र जी के लौटने की खुशी में दीप मालायें जलाकर महोत्‍सव मनाया था । इस दिन उज्‍जैन सम्राट विक्रमादित्‍य का राजतिलक भी हुआ था । विक्रमी संवत् का आरम्‍भ तभी से माना जाता है अत: यह नर्व वर्ष का प्रथम दिन भी है ।
एक जमाना था जब रैगर समाज में दीपावली से पूर्व बालकों के हाथों में दीपक लेकर हीड़ गाते हुए घरों के आगे चक्‍कर लगाते थे । दीपावली पर घरों को चमकाने व माण्‍डने बनाने के लिए पहले गेरू और खड़ी का उपयोग होता था । घर की और घरों के बाहर बने माण्‍डणों पर दीपक रखा जाता था । रैगर बालिकायें अपने सिर पर छिद्रयुक्‍त मटकी सा हाथ में छिद्रयुक्‍त कुल्‍हड़ लेकर और उसमें दीपक जलाकर रैगर मौहल्‍ले के घर घर गायन करने जाती थी । इसके अलावा लक्ष्‍मी पूजा के साथ गाय की पूजा की जाती थी । आजकल रैगर समाज में इस दिन बाजार में मिलने वाले लक्ष्‍मी जी की तस्‍वीर को दीवार पर चस्‍पाकर लेते हैं । या दीवार पर गेरूआ रंग से गणेश लक्ष्‍मी की मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं । गणेश लक्ष्‍मी की मिट्टी की प्रतिमा या चांदी की प्रतिमा बाजार से लाकर दीवार पर रखी लक्ष्‍मी गणेश के चित्र के सामने रखकर पूजा करते हैं । थाली में दीपक रखकर उन्‍हें प्रज्‍जवलित करने के बाद जल, रोली, खील बताशे, चावल, गुड़, अबीर, धूप आदि से पूजनकर टीका लगाते हैं । इस दिन रैगर जाति के लोगों के घरों में चावल व हरा मूंग उबालकर बनाते हैं । उसमें मीठी बुरा अर्थात पिसी हुई चीनी और देसी घी डालकर लक्ष्‍मी ली को इसका भोग लगाने के बाद यह भी प्रसाद के रूप में खाया जाता है । स्त्रियां चावलों का बायना निकालकर उस पर रूपये रखकर अपनी सास के चरण स्‍पर्श करती है और आशीर्वाद प्राप्‍त करती है पूजा करने के बाद दीपकों को घर में जगह-जगह पर रख देते हैं । एक बड़ा अर्थात चौमुखा दीपक गणेश लक्ष्‍मी जी के पास रख देते हैं । पूजा करने के बाद सभी स्त्रियां और पुरूष अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने के लिये मौहल्‍ले में निकल जाते हैं । सभी स्त्रियां और पुरूष सजधज कर आशीर्वाद लेने की क्रिया में सम्मिलित होते हैं । दूसरे दिन प्रात: चार बजे पुराने छाज में कुड़ा रखकर कूड़े को दूर फेंकने के लिये ले जाते हैं ।
26. गोवर्धन पूजा: कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्‍सव मनाया जाता है । रैगर जाति की महिलायें गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल, दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते है तथा प्ररिक्रमा करते हैं ।
27. भाई दुज: रैगर जाति में भाई बहन की अमर प्रेम के दो त्‍यौहार आते हैं- एक रक्षा बंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है जिसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है । दूसरा भाई दूज का त्‍यौहार आता है जिसमें बहन भाई की लम्‍बी आयु की प्रार्थना करती है । भाई दूज का त्‍यौहार कार्तिक मास को द्वितीया को मनाया जाता है । इस‍ दिन बहने बेरी-पूजन भी करती है । इस दिन बहन भाई को भोजन कराकर तिलक लगाकर नारियल का गोला देती है । इस दिन बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्‍व है ।
28. देव उठनी ग्‍यारस अर्थात देवात्‍थान एकादशी: कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की एकादशी देवोत्‍थान के रूप में मानाई जाती है । मांगलिक कार्य शुरू किये जाते हैं । इस दिन को रैगर जाति के लोग अनबुझा विवाह का दिन मानते हुए अपने बच्‍ची का विवाह सम्‍पन्‍न करते हैं ।
पौष माह के पर्व:
29. मकर संक्रान्ति: पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर होता है तभी मकर संक्रान्ति होती है । अंग्रेजी कलेण्‍डर के अनुसार मकर संक्रान्ति हमेशा 14 जनवरी को होती है । दक्षिण भारत में इसको पोंगल कहा जाता है ।
       रैगर समाज के लोग इस दिन तिल के लड्डू गुड़ के अन्‍दर बनाते हैं । चीटियों को आटे में गुड़ मिलाकर डालते हैं और गायों को चारा खिलाते हैं । शाम को बहन बेटियों को खाने पर आमंत्रित करते हैं और चूरमा दाल बाटी अथवा स्‍वादिष्‍ट भोजन बनाते हैं । रैगर जाति में यह भी मान्‍यता है कि ससुराल के काले तिल नहीं खाना चाहिये अन्‍यथा उसे चुकाना पड़ता है । इस दिन राजस्‍थान में पतगें भी उड़ाई जाती है ।


माघ माह के पर्व:

30. गणेश चतुर्थी: गणेश चतुर्थी का व्रत माघ मास की कृष्‍ण पक्ष कर चतुर्थी को रखा जाता है । जिसे रैगर समाज भी मानता है।
31. बसंत पंचमी: माघ मास की शुक्‍ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी के रूप में रैगर समाज मनाता है । यह दिन ऋतुराज बसन्‍त के आगमन की सूचना देता है । रैगर इस दिन शुभ कार्य जैसे गृह निर्माण, विवाह आदि भी करते हैं ।
फालगुन मास के पर्व:
32. महाशिव रात्रि: महाशिव रात्रि व्रत फाल्‍गुन मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है । प्राय: रैगर महिलायें शिवजी का व्रत रखकर भगवान शिव को जल चढ़ाकर फल आदि ग्रहण करती है । भरकर रोली, मोली, चावल, दूध, घी, बेल पत्र आदि का प्रसाद शिव को अर्पित करते हैं ।
33. होली का बड़ कुल्‍ला: रैगर जाति के लोग होली से पन्‍द्रह दिन पहले किसी शुभ दिन गाय के गोबर से सात बड़कुल्‍ला बनाते हैं । फाल्‍गुन शुक्‍ल एकादशी को गोबर की पांच ढाल, एक तलवार, एक चांद सूरज, आधी रोटी, एक होलिका भाई और एक पान बनाते हैं । बड़कुल्‍ला को माला में पिरोते हैं ।
34. होली: होली का पर्व फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । होली के आठ दिन पहले से होलाष्‍टक प्रारम्‍भ होता है । रैगर जाति के लोग इसे 'होली का डांडा' रोपना भी कहते हैं । होली का डांडा रोपने के बाद जब तक होली नहीं जलती तब तक कोई भी शुभ कार्य करना रैगर समाज में वर्जित माना जाता है । इस दिन सायंकाल के बाद भद्रा रहित लग्‍न में कच्‍चे सूत की लड़ी, जल का लोटा, बूट अर्थात कच्‍चे चने की डाली आदि से पूजा करने के बाद होलिका दहन किया जाता है । होली दहन के दूसरे दिन होलिका के उत्‍सव पर एक दूसरे के गुलाल और रंग लगाकर प्रेम व भाई चारे का उदाहरण प्रस्‍तुत करते हैं ।
अन्‍य प्रमुख व्रत और त्‍यौहार
35. सोमवती अमावस्‍या: जो अमावस्‍या सोमवार को पड़ती है उसे सोमवती अमावस्‍या कहते हैं । सोमवार चन्‍द्रमा का दिन है । इस दिन सूर्य तथा चन्‍द्रमा एक सीध में स्थित रहते हैं इसलिये यह पर्व विशेष पुण्‍य फल वाला माना जाता है । रैगर महिलायें इस दिन व्रत रखकर अच्‍छे भविष्‍य की कामना करती है ।
36. मल मास: जिस मास में सूर्य संक्रान्ति नहीं होती उसे अधिमास अर्थात मल मास कहते हैं । अधिमास 32 मास 16 दिन तथा चार घड़ी के अन्‍तर से आता है । अधिमास में अर्थात मल के महिने में रैगर जाति के लोग कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं ।
37. पीपल पुण्‍यू: रैगर जाति में इस दिन बिना किसी पंडित से पूछे विवाह सम्‍पन्‍न किये जाते हैं ।

 

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(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

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