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Raigar Caste Progress

           आर्थिक विकास :- रैगर जाति आर्थिक दृष्टि से ए‍क पिछड़ी हुई कौम है । रैगर जाति के आर्थिक पिछड़ेपन के अनेकों कारण हैं । मगर प्रमुख कारण इनमें व्‍याप्‍त कुरीतियाँ हैं । समय के साथ परिवर्तन आवश्‍यक है । जो समाज समय के साथ नहीं चलता वह विकास की दृष्टि से पिछड़ जाता है। समय अविरल गति से चलता रहता है, वह किसी का इन्‍तजार नहीं करता । जो जाति पुरानी रूढ़ियों और कु‍रीतियों से ही चिपकी रहती है, वह अन्‍य जातियों की तुलना में पीछे रह जाती है । अच्‍छी परम्‍पराओं का निर्वाह होना चाहिये मगर जो कुरीतियाँ समाज के विकास की गति को उवरूद्ध करती है उन्‍हें त्‍याग देना चाहिये । परम्‍पराएं और रीति-रिवाज समाज या जाति की संस्‍कृति की रक्षा करती है, मगर कुरीतियाँ और रूढ़ियाँ समाज को पतन की तरफ ले जाती है । रैगर जाति में आज भी अनेकों कुरीतियाँ व्‍याप्‍त हैं । बाल-विवाह, अनमेल विवाह, औसर-मौसर, मृत्‍युभोज आदि । इन कुरीतियों के घेरे में रैगर जाति बुरी तरह फंसी हुई है । कर्ज लेकर भी नइ कुरीतियों का पालते जा रहे हैं । इसलिए गरीबी पीढ़ि दर पीढ़ि विरासत में मिलती जाती है । रैगर जाति की बरबादी का यह एक बहुत बड़ा कारण है कि उनमें इस तरह की फिजूल खर्ची की आदत है । इन कुरीतियों के अतिरिक्‍त उनमें कुछ ऐसी सामाजिक बुराइयां भी हैं जिनकी वजह से वे ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं । उदाहरण के लिए शराब, बीड़ी, सिगरेट, चाय आदि की बुरी आदतें हैं । महानगरों में कुछ यवकों में चरस, गांजा, जुआ तथा सट्टे की आदतें भी हैं । रैगर जाति में जितने भी शिक्षित और नौकरी पेशा हैं, उनमें से ज्‍यादातर शराब तथा सिगरेट पीन का शौक रखते हैं । वे इसे फैशन के रूप में अपनाते जा रहे है । रैगर जाति में शराब का प्रयोग अत्‍यधिक होने से आर्थिक दृष्टि से वे सम्‍भल नहीं पा रहे हैं । यह जाति शराब के सेवन में ही बरबाद हो रही है । यदि रैगर जाति आगे बढ़ना चाहती है तो इन बुराईयों और कुरीतियों को त्‍यागना पड़ेगा, फिजूल खर्ची को रोकना पड़ेगा ।

           रैगर जाति का चमड़े रंगने का धन्‍धा परम्‍परागत है । परम्‍परागत धन्‍धे को परम्‍परागत तरीकों से नहीं कर आधुनिक तरीकों से किया जाय तो ज्‍यादा लाभप्रद हो सकता है । परम्‍परागत धन्‍धे के परीकों में परिवर्तन होना जरूरी है । उदाहरण के लिए पहले भारतीय कृषि में परम्‍परागत साधनों को ही काम मे लाया जाता था । इसलिए खाद्यान्‍न के उत्‍पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई । मगर आज कृषि में आधुनिक एवम् वैज्ञानिक साधनों- ट्रेक्‍टर, खाद तथा सुधरी किस्‍म के बीज काम में लेने लगे हैं । इससे भारत का खाद्यान्‍न उत्‍पादन पहले से बहुत बढ़ा है । इसी तरह रैगरों को भी परम्‍परागत धन्‍धे में नवीन एवम् आधुनिक तकनिक को अपनाना चाहिये तभी उन्‍हें अधिकतम लाभ मिल सकेगा और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकेगा । रैगर पीढ़ि दर पीढ़ि जो धन्‍धा करते चले आ रहे हैं, उसी से वे चिपके हुए हैं । कटु सत्‍य तो यह है कि जिन परम्‍परागत तरीकों से यह धन्‍धा कर रहे हैं आज स्‍वयं रैगरों को उससे घृणा होती है । कुछ वर्षों पहले मेघवाल जाति के लोग मरे हुए जानवरों को घसीटने तथा खाल निकालने का काम करते थे । लोग उनसे घृणा करते थे । मेघवालों ने संगठित होकर ऐसा घृणित धन्‍धे को त्‍याग दिया । आज मेघवाल जाति के लोग इज्‍जत से जी रहे है । रैगर भी अपने परम्‍परागत धृणित धन्‍धे को त्‍याग सकते हैं । इसके लिए केवल इच्‍छा शक्ति और दृढ़ संकल्‍प की आवश्‍यकता है । आज के युग में जब अनेकों प्रकार के नये धन्‍धे करने के अवसर हैं और सरकार किसी भी प्रकार के धन्‍धे करने के लिए आर्थिक मदद करने को तैयार है तब रैगरों को परम्‍परागत धन्‍धे को बदलने में शिथिलता नहीं बरतनी चाहिये । परिस्थितियाँ इतनी अनुकूल है कि इसके लिए जातिगत निर्णय लेने की भी आवश्‍यकता नहीं है और व्‍यक्तिगत रूप से धीरे-धीरे नये धन्‍धे अपना सकते हैं ।

           रैगर जाति की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सत्‍य है कि बड़े परिवार को वे अच्‍छी तरह संभाल नहीं सकते । कम आदमी हो और परिवार में सदस्‍यों की संख्‍या अधिक हो तो जीवन स्‍तर ऊपर उठना कठिन होता है । रैगर जाति को तो ऊपर उठने के लिए छोटे और सुनियोजित परिवार अपनाने चाहिये । इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर अच्‍छा प्रभाव पड़ेगा । दो बच्‍चों का दायित्‍व भी आज की परिस्थितियों में कम नहीं है । परिवार नियोजन में रैगर जाति को विशेष रूचि लेना चाहिए क्‍योंकि उसी में उनका हित है । रैगर जाति का भावी आर्थिक विकास इसी बात पर निर्भर करता है ।

           अशिक्षित समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता । रैगर जाति के पिछड़ेपन का एक मुख्‍य कारण तो उनमें शिक्षा का अभाव है । अनुसूचित जातियों तथा जन जातियों के शिक्षा के विकास के लिए सरकार ने पर्याप्‍त सुविधाएं दे रखी है । उनके छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है । समाज कल्‍याण विभाग द्वारा उनके लिए छात्रावास चलाये जाते हैं जहां आवास, भोजन, कपड़ा, पुस्‍तकें, साबुन, तेल वगैरा तमाम सुविधाएं मुफ्त प्रदान की जाती है । भारत में इलाहाबाद, मद्रास, बेंगलोर, चण्‍डीगढ़ तथा जयपुर आदि अनेकों जगहों पर इन जातियों के छात्रों को उच्‍च सेवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पूर्व प्रशिक्षण नि:शुल्‍क दिये जाने की व्‍यवस्‍था है । रैगर जाति को सरकार द्वारा दी जाने वाली इन तमाम सुविधाओं का भरपूर लाभ उठाना चाहिए ।

           आर्थिक दृष्टि से कमजोर और पिछड़े वर्ग के लिए सरकार ने बीससूत्री कार्यक्रम चलाया है । स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला मौका है जब कि पिछड़ा वर्ग अपनी आर्थिक-स्थिति सुधार सकता है । उनकी आर्थिक-स्थिति को सुधारने के लिए ही बीससूत्री कार्यक्रम के अन्‍तर्गत उनके पुराने कर्जे माफ कर दिए गए हैं, सागड़ी प्रथा समाप्‍त कर दी गई है, कारोबार करने तथा साहूकारों के चंगुल से मुक्‍त करने के लिए बैंकों से कम ब्‍याज पर आसान किस्‍तों में ऋण दिये जा रहे हैं । रैगर जाति को इसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए और माली हालत सुधारनी चाहिए । आर्थिक दृष्टि से ऊपर उठने का यह एक सुनहरा अवसर है ।

           रैगरों में यह स्‍वविवेक जागृत होना जरूरी है कि ऊपर उठाने के एि सरकार हमारी मदद कर सकती है, मगर ऊपर उठना तो स्‍वयं को ही है । उनमें स्‍वयं में आगे बढ़ने की इच्‍छा, उत्‍साह तथा जोश होना चाहिए । इसके लिए उनको स्‍वयं को क्रियाशील होना पड़ेगा । कटिबद्धता एवं दृढ़ संकल्‍प से ही रैगर जाति का तैजी से आर्थिक विकास संभव है ।

 

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत 'रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति)

 

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