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Raigar Rivaj

      भारत में यदि जाति प्रथा नहीं होती और उनमें चली आ रही पीढ़ि दर पीढ़ि परम्‍पराएं और रीति-रिवाज नहीं होते तो भारतीय संस्‍कृति का नामों निशान कभी का मिट गया होता । जातियों के रीति-रिवाजों ने भारतीय संस्‍कृति को जिन्‍दा रखा । हर जाति के सगाई (मंगनी), विवाह, गोंणा तथा अन्‍य रीति-रिवाज भिन्‍न-भिन्‍न हैं । ये रीति-रिवाज और परम्‍पराएं ही प्रत्‍येक जाति की पृथक् पहि‍चान बनाये हए हैं । रैगर जाति की भी अपनी परम्‍पराएं और रीति-रिवाज है । आज की युवा पीढ़ि कुछ प्राचीन परम्‍पराओं और रीति रिवाजों को स्‍वीकार नहीं कर, वर्तमान परिस्‍थ‍ितियों के अनुरूप चलना चाहती है । यह कोई आलोचना का विषय नहीं है बल्‍कि ऐसा परिवर्तन समय और परिस्थितियों के अनुसार स्‍वाभाविक रूप से होता आया है । रैगर जाति में प्रचलित रीति-रिवाज और परम्‍पराओं का विस्‍‍तृत विवरण दिया जा रहा है ।

 

New Son

       नामकरण - बच्‍चा जन्‍म लेने के बाद ब्राह्मण को पूछकर बच्‍चे का नामकरण किया जाता है ।

 

       सूर्य पूजा - ब्राह्मण से सूर्य पूजा का मुहूर्त पूछते हैं । फिर सूर्य पूजा के दिन बच्‍चे की माँ नहा धोकर तैयार होती है और नये कपड़े पहिनती है । घर के चौक में चौका लगाकर माँ अपने बच्‍चे को गोद में लेकर सूर्य की तरफ मुंह करके पाट पर बैठती है । मीठा खाना बनाया जाता है जिससे सूर्य पूजन करते हैं । पूजा के वक्‍त पाट के सामने अनाज की ढेरी पर पानी से भरा कलश रखा जाता है तथा कलश में नीम का झंवरा (टहनी) रखा जाता है ।

 

       जलवा पूजन - बच्‍चा पैदा होने के महीने सवा महीने बाद अच्‍छा वार देखकर माँ जलवा पूजन करती है । जब तक जलवा पूजन नहीं होता है, तब तक स्‍त्री न तो पीने के पानी के मटके के पास जाती है और न रसोई में प्रवेश करती है । जलवा पूजन करने के लिए स्‍त्री नये कपड़े पहिन कर कलश और चरवी सिर पर रखकर चरवी में नीम का झंवरा डालकर अन्‍य औरतों के साथ तालाब पर जाती है । वहाँ जल की पूजा करती है । स्‍त्री अपना कलश और चरवी पानी में भरकर घर लाती है । जलवा पूजन के बाद ही स्‍त्री पानी और रसोई संबंधी कार्य करती है ।

 

       ढूंढ - बच्‍चे पैदा होने के बाद पहली होली पर ढूंढ की जाती है । ढूंढ लड़का और लड़की दोनों की एक समान होती है । होली के दूसरे दिन प्रात: मोहल्‍ले के सब लोग इकट्ठे होकर जिसके घर बच्‍चा पैदा हुआ है, उसके घर जा‍ते हैं । घर के चौक में पाटे पर बच्‍चे का नजदीकी रिश्‍तेदार बच्‍चे को गोद में लेकर बैठता है । एक बांस लेकर दो आदमी दोनों सिरों को पकड़ कर खड़े हो जाते हैं । दूसरे सभी आदमीयों के हाथों में लकड़ीयें होती है जिनसे बांस पर हल्‍की चोट मारते जा‍ते हैं और निम्‍न गीत गाते जाते हैं-

      हरि हरि रे हरिया दे, जीमणे हाथ सबड़को ले ।

      डावे हाथ चंवर डुला, जिण घर जितरी डिकरियां ।

      उण घर उतरा डीकरा, गेरियों री पूरी आश । ।

       अंत में बांस को हाथों में ऊपर उठाते हुए कामना करते हैं कि बच्‍चा बांस से भी ज्‍यादा लम्‍बा बढ़े । बच्‍चे का बाप ढूंढ करने वालो को एक नारियल तथा गुड़ देता है यदि प्रथम लड़के की ढूंढ है तो खुशी से शराब भी पिलाते हैं । मोहल्‍ले की ढूंढ पूरी हो जाती है तब सब जगह से इकट्ठे हुए नारियल और गुड़ को मोहल्‍ले में बांट देते हैं ।

      बच्‍चे की बुआ ढूंढ के मौके पर ढूंढेकड़ा लाती है जिसमें बच्‍चे के कपड़े, जेवर तथा खिलौनें लाती है । खर्चा अपनी क्षमता के अनुसार किया जाता है मगर बच्‍चे का बाप अपनी बहिन जितना खर्चा करती है उससे ज्‍यादा ही खर्चा करता है । ढूंढेकड़ा लड़का होने पर ले जाया जाता है, लड़की पैदा होने पर नहीं ।

 

Sagai

       सगाई - इसे सगपण, संबंध, मगनी या रिशता तय करना भी कहते है । दूसरी जातियों की तरह रैगर जाति में भी सम गोत्र में सगाई नहीं होती है । सगाई करते चक्‍त मां, बाप, दादी तथा नानी की गोत्र टालते है । लड़का-लड़कियों की सगाई प्राय: छोटी उम्र में ही तय कर दी जाती है क्‍योंकि लड़की बड़ी होने पर योग्‍य लड़का मिलने कि समस्‍या रहती है । रिश्‍ते की बात प्राय: तीसरे आदमी के जरिये शुरू करवाई जाती है । संबंध करने में लड़का-लड़की की बात बहुत कम ध्‍यान में रखी जाती है । मां बाप ही फैसला करते है । दानों पार्टियें रिता करना चाहती है तो लड़का-लड़की को एक दूसरी पार्टी उनके घर जाकर देख लेती है । लड़का-लड़की एक-दूसरी पार्टी को पसंद है तो लड़की का बाप बेटे के बाप और उसके आदमियों को रिश्‍ता पक्‍का करने के लिए अपने घर बुलाता है । अच्‍छा वार देखकर सगाई की जाती है । सगाई के वक्‍त मोहल्‍ले के ं को बुलाया जाता है । इन सबके सामने सगाई की रस्‍म होती है । लड़की का बाप एक थाली में नारियल, गुड़ तथा समधण के ब्‍याउज का का कपड़ा लाकर रख देता है । लड़के का बाप दूसरी थाली में एक खोपरा लाकर रख देता है । लड़का-लड़की का बाप आमने-सामने बैठ जाते है और थालियों की अदला-बदली करते हैं । थाली अदला-बदली में लड़के के बाप की थाली ऊपर तथा लड़की के बाप की थाली नीचे रखी जाती है । थाली अदला-बदली करने से पहले लड़की का बाप लड़के का नाम पूछता है तथा लड़के का बाप लड़की का नाम पूछता है । थाली अदला-बदली के बाद दोनों समधी आपस में एक दूसरे के मुंह में गुड़ देते हैं । मोहल्‍ले के पंच लड़के के बाप से सवा दो रूपया पिलाई (शराब पिलाने) का तथा एक रूपया कम्‍बल छपाई का लेते है । पिलाई के पैसे पंचों के पा रहते हैं । तथा एक रूपया कम्‍बल छपाई का बेटी की मां को देते हैं । अलग-अलग जगहों पर यह लागभाग अलग-अलग होती है । आजकल की पीढ़ि इस लागभाग में विश्‍वास नहीं करती है । सगाई की रस्‍म के आखिर में लड़की का बाप केसरिया या गुलाबी रंग लाकर सगे संबंधियों के कपड़ों पर डालता है । रंग डालने से यह बात पक्‍की हो जाती है कि सगाई पक्‍की हो गई है । सगाई के समय या बाद में रैगर जाति में दहेज न तो मांगा जाता है और न तय किया जाता है । रैगर जाति में टीके का रिवाज बहुत कम है ।

 

      रीत - सगाई के चार छ: महिने बाद बेटी का बाप बेटे के बाप से रीत मंगवाता है जिसमें बच्‍ची के जेवर तथा कपड़े, चूडि़याँ, रिबन वगैरा मंगवा लेते है । जेवर में चांदी 40 तोले से 80 तोले तक मंगवा लेते है । अधिकतर लोग बच्‍ची के केवल कपड़े मंगवाते है, जेवर नहीं मंगवाते है । बच्‍ची का बाप इस मौके पर बेटे के बाप और उसके परिवार को कपड़े करता है ।

 

       लग्‍न - लड़का-लड़की विवाह योग्‍य हो जाते है तो बात-चीत के जरिये विवाह का अनुमानित समय तय कर लिया जाता है । पण्डित से विवाह का लग्‍न निकलवाया जाता है । लड़की का बाप पण्डित से लग्‍न लिखवाता है जिसमें एक कागज पर विवाह की तिथि तथा समय आदि लिखा जाता है । लग्‍न में पीले चावल, सुपारी, कुंमकुम तथा एक रूपया डालकर कुंमकुंम के छीटे डाले जाते है । चोटी वाले नारियल के साथ लग्‍न तथा अन्‍य सामग्री को मोली (कच्‍चे सूत) से बांध देते हैं । इस लग्‍न और नारियल को बेटी का बाप नाई, ढाडी, नाथ या अपने किसी आदमी के साथ बेटे के बाप के घर भेज देता है । बेटे का बाप अपने नजदीकि रिश्‍तेदारों या मोहल्‍ले वालों को इकट्ठा कर लग्‍न ले लेता है । लड़के का बाप लग्‍न लोन वाले को अपनी इच्‍छानुसार भेंट देकर वापस रवाना कर देता है ।

 

       पाट बिठाना - लग्‍न लाने के बाद लड़का और लड़की को विवाह के सप्‍ताह-दस दिन पहले पाट बिठाते हैं । इस रस्‍म को फूल पहिनाना भी कहते है । मारवाड़ में वान बिठाना भी कहते हैं । अच्‍छा वार देखकर पाट बिठाया जाता है । पाट बिठाते है तब मोहल्‍ले के आ‍दमियों और औरतों को बुलाते हैं । औरतें गीत गाती हैं । लड़का या लड़की जिसकी शादी होनी होती है उसको चौक में पाट (बाजोट) रख कर उस पर बिठाते हैं, तिलक करते हैं । तिलक मां, भोजाई या बहिन करती है । कटोरी में घी डालकर पाट पर बैठे को ही पिलाते हैा तथा मुंह में गुड़ देते हैं । गले में फूलों या रेशम की माला पहिनाते हैं । हाथ में कटारी या तलवार इी जाती है जो फेरे होने तक उनके पास ही रहती है । सोने चांदी के जेवर भी पहिनाते हैं । दुलहा या दुलहन को पाट बिठाने के बाद शाम को रोजाना मोहल्‍ले की औरतें इकट्ठी होकर गीत गाती है । पाट बिठाने के बाद रोजाना घी पिलाते हैं तथा अच्‍छे से अच्‍छा खाना खिलाते हैं ।

 

       बंदौला - पाट बिठाने वाले दिन मोहल्‍ले के सब लोग विवाह वाले के घर बुलाने प इकट्ठे होते हैं । जहां बड़े माहल्‍ले होते हैं वहाँ धड़े होते है । एक मोहल्‍ले में कई धड़े हो सकते हैं । अपने अपने धड़े के लोग ही शादी विवाह में आते हैं । पाट बिठाने वाले रोज दुलहा हो या दुलहन का बाप मोहल्‍ले या अपने धड़े के घरों में गुड़ बांटता है । सगे भाइयों को एक-एक किलों तथा दूसरों को आधा-आधा किलों गुड़ देते हैं । गुड़ लेने वाले को बन्‍दौला देना पड़ता है । बन्‍दौले में दलहा हो या दुलहन को एक समय का खाना खिलाने से पहले घी जितना पी सकता हो पीलाते हैं । खाने में विशष भौजन बनाया जाता है । बंदौला खाने जाते हैं तब दुलहा या दुलहन अपने साथ चार छ: आदमी तक ले जाते हैं । सगे भाई बंदौला देते हैं उसमें सभी सगे भाइयों के पूरे परिवार को खाने पर बुलाते हैं । इसे सीगरी न्‍यौता कहते हैं ।

 

       विनायक पूजा - पण्डित को पूछकर शा‍दी के पांच या सात दिन पहले विनायक(गणेशजी) लाते हैं । दुलहा हो या दुलहन के घरवाले मोहल्‍ले या धड़े की औरतों को इकट्ठा करते हैं और सभी औरतें गीत गाती हुई कुम्‍हार के घर विनायक लाने जाती है । दुलहा दुलहन की मां विनायक लाने जाते समय थाल में गेहूं, गुड़, कुंमकुंम, लाल कपड़ा तथा कच्‍चे सूत की माला ले जाती है । गेहूं और गुड़ कुम्‍हार को दे देते हैं । कुम्‍हार मिट्टी का बना हुआ विनायक देता है । जिसके कुंमकुंम का टीका लगाकर, लाल कपड़ा ओढ़ा कर गले में कच्‍चे सूत की माला डालकर थाल में बिठा कर औरतें विनायकजी के गीत गाती हुई घर लाती है । विनायक के साथ एक बड़वेला भी लाते हैं । विनायक की रस्‍म लड़का या लड़की की शादी में एक समान है । विनायक लाकर घर में गेहूं की ढेरी पर बिठा देते हैं और वहां रंग के मांडणें जिसमें दुलहा-दुलहन के चित्र वगैरा विभिन्‍न रंगों से बनाते हैं । उस स्‍थान पर मेहन्‍दी तथा कुंमकुंम की सात-सात टिकियाँ अंकित कर देते हैं । शाम को परिवार तथा मोहल्‍ले वाले विनायक पूजन करते हैं । मीठा खाना बनाते हैं जिससे विनायक पूजते हैं । बारी-बारी से आदमी और औरतें हाते हैं और विनायक पूजा करके इच्‍छानुसार रूपये पैसे विनायकजी के सामने डाल देते हैं । विनायक पूजा में जितने भी पैसे आते हैं उसको बहिन बेटियाँ आपस में बांट लेती हैं । विनायक लाने के बाद रोजाना सुबह भी गीत गाना शुरू कर दिया जाता है । दुलहा या दुलहन के रोजाना मेहन्‍दी लगाना भी शुरू कर दिया जाता है । विनायक लाने के बाद रोजाना शाम को पीठी (उबटन) करना भी शुरू कर देते हैं ।

 

       पीठी (उबटन) - जौ का आटा तथा हल्‍दी मिलाकर पीठी बनाई जाती है । विनायक लाने के बाद हर रोज शाम को दुलहा हो या दुलहन के पीठी की जाती है । पीठी करते वक्‍त घर के चौक में पाट रखकर दुलहा या दुलहन को बिठाया जाता है । पीठी करने से पहले तेल चढ़ाया जाता है । तेल हम उम्र का चढ़ाता है । दुलहन के तेल कुंवारी लड़की तथा दुलहे के कुंवारा लड़का चढ़ाता है । तेल चढ़ाने वाला अपने दोनों हाथों के अंगूठों को तेल में डूवोकर पांवों के नाखूनों से शुरू करके शरीर के जोड़ों की जगह- टखना, घुटने, कमर, कन्‍धों तथा सिर पर अंगूठे रखते हुए चढ़ाता है । विनायक लाने वाले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, चौथे दिन चार बार तथा पांचवें दिन पांच बार तेल चढ़ाया जाता है । जि‍तनी बार तेल चढ़ाया जाता है फेरों वाले दिन उतनी ही बार घी से उलटा उतारा जाता है । घी से उलटा उतारने में सिर से शुरू करके कन्‍धे, कमर, घुटनों, टखनों से पांवों के नाखूनों पर उतारा जाता है । तेल चढ़ाने के बाद ही पीठी शुरू की जाती है । पीठी पूरे शरीर पर की जाती है । दुलहन के पीठी उसकी सहेलियाँ तथा दुलहे के अपने साथी पीठी करते हैं । पीठी करते वक्‍त औरतें गीत गाती रहती है । पीठी से शरी सुन्‍दर और कोमल बनता है ।

 

       नेत (न्‍यौत) - बड़ी बंदौली के दिन सारे मेहमान आ जाते हैं । और असी दिन नेत लिया जाता है । लड़की की शादी हो तो बड़ी बंदौली के दिन या फेरों के दिन भी नेत ली जा सकती है । अपने भाई, रितेदार या विशेष तालुकात वाले लोग नेत डालते हैं । हर घर में नेत की बही रहती है जिसमें शादी की तिथि वगैरा लिखी जाती है । बही में लिखना शुरू करने से पहले कुंमकुंम का स्‍वास्‍तिक (साखिया) बनाकर कुंमकुंम के छीटे डाले जाते हैं । स्‍वास्‍तिक के ऊपर गणेश जी का नाम जरूर लिखते हैं । दुलहा या दुलहन को पाट पर बिठाया जाता है । एक थाल में कुंमकुंम, चावल वगैरा रख दिया जाता है । नेत लेना शुरू करने से पहले नाथ, ढाडी या किसी आदमी को भेजकर मोहल्‍ले वालो को सूचित करवा दिया जाता है । जब सब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब नेत लेना शुरू किया जाता है । औरतें गीत गाती रहती है । नेत लेने में सबसे पहले भाइयों तथा बाद में रिश्‍तेदारों और मोहल्‍ले वालों का लिया जाता है । नेत में नेत लेने वाले ने जितने पैसे डाल रखे हैं उससे दुगना करके वापस डाला जाता है । उदाहरण के लिए दुलहन या दुलहे के बाप ने पचास रूपये डाले थे तो अब नेत डालने वाला वापस एक सौ रूपये डाल देते हैं । नेत के बाद पंच लोग पैसे की गिनती करते हैं । रिवाज यह है कि नेत में जितनी रकम आती है वो सारी थाल में रखकर दुलहा या दुलहन के सामने रखी जाती है और उसे कहा जाता है कि अपनी मुठ्ठी में जितने उठा सकते हैं, उठा लें । इसे मूंठ भरवाना कहते हैं ।

 

       बंदौली - जिस दिन विनायक घर लाया जाता है उसी दिन से शाम को रोजाना बंदौली निकाली जाती है । बंदौली पीठी करने के बाद नया औरना (साड़ी) या कपड़े का पर्दा तानते हैं । कपड़े को चारों कोनों से चार औरतें पकड़ती हैं और दुलहा या दुलहन को बीच में खड़ा कर देते हैं । यदि दुलहा है तो तलवार से पर्दे को थोड़ा ऊपर उठा लेता है । दुलहा या दुलहन की बहिन या बुआ एक थाल में चावल, कुंमकुं, गुड़, जलता हुआ दीपक, जल से भरा कलश, खड़ा नमक, कपास तथा पीठी की चार गोलियाँ डाल कर दुलहा या दुलहन के पीछे चलती रहती है । बंदौली जैसे ही शुरू होती है, ढोल बजना शुरू हो जाता है । बंदौली घर के दरवाजे से शुरू होकर देवस्‍थान या फलसे तक बहुत ही धीमी चाल से जाती है । औरतें गीत गाते चलती है । देवस्‍थान या फलसे पर जाकर बंदौली रूकती है तो बहिन या बुआ दुलहा या दुलहन के सामने आकर खड़ी हो जाती है । थाल उसके हाथ में पकड़ा देती है । दोनों हाथें से थाल में से पीठी की गोलियें उठाकर उसके शरीर के जोड़ों से अर्थात् नाखून, टखनों, घुटनों, कमर, कन्‍धों तथा सिर से ऊपर होते हुए चारों दिशाओं में फैंक देती है । आरती उतारकर बंदौली वापस मुड़ती है । जिस चाल और रीति से बंदौली जाती है असी तरह से वापस लौटती है । फैरों के पहले रोज बड़ी बंदौली निकाली जाती है । बड़ी बंदौली की रात रातीजबा किया जाता है ।

 

       बेहमाट - यदि लड़की की शादी है तो फैरों के दिन औरतें गीत गाती हुई कुम्‍हार के घर जाती है और बेहमाट लाती है । पांच मटकों का बेहमाट लाती है । कम ज्‍यादा माटों का भी लाया जा सकता है । एक जोड़ी बेहमाट लाया जाता है जो दरवाजे के दोनों तरफ रखे जाते हैं । बेहमाट के साथ बड़बेला भी लाया जाता है जो बेहमाट पर लाल और सफेद रंग की लकीरें डालकर सुन्‍दर बनाया जाता है । बेहमाट कुम्‍हार को पूरी कीमत देकर लाया जाता है । पहले कुम्‍हार को बेहमाट की कीमत नहीं दी जाती थी और कुम्‍हार का नेक होता था जिसमें शादी के बाद उसे दलिया, गुड़, घी तथा कपड़े दिये जाते थे । मगर अब यह प्रथा समाप्‍त हो गई है ।

 

       थाम्‍भ - लड़की की शादी पर तोरण और थाम्‍भ की व्‍यवस्‍था किया जाना अनिवार्य होता है । थाम्‍भ लकड़ी का बना होता है । एक लम्‍बी लकड़ी पर चार खुटियें लगी होती है । ये लाल या गुलाबी रंग से रंगी हुई होती है । इन खुंटियों के बीच एक बड़बेला रखा जाता है और उसके ऊपर नया लाल कपड़ा लपेटा जाता है । इनको मूंज की नई रस्‍सी से बांध दिया जाता है । इस थाम्‍भ को चंवरी में अगनी कुण्‍ड के पास ही जमीन में गाड़कर खड़ा किया जाता है । दुलहा-दुलहन इस थाम्‍भ के चारों तरफ फेरे लेते हैं । शादी के बाद बरात जब वापस रवाना होती है तब दुलहा जाकर थाम्‍भ पर बंधी मूंज को खोलता है । इसे जूंण खोलना कहते हैं । उस वक्‍त दुलहे को उसकी सासु मुजरा करने में पैसे या जेवर देती है ।

 

       तोरण - यह भी लकड़ी का बना हुआ सुथार के घर से कीमत देकर लाते हैं । आज कल तोरण कई तरह के बनाये जाते हैं । तोरण में पांच चिड़ियें बनाई हुई होती है । दुलहा जब शादी करने आता है तब तलवार से इसे वांदता है । तोरण पर तलवार से दुलहा जब हल्‍की चोट मारता है तो इस रस्‍म को तोरण वांदना कहते हैं । तोरण घर के दरवाजे के ठीक ऊपर लगाया जाता है ।

 

       बरात - यदि लड़के की शादी है तो नेत लेने के बाद मोहल्‍ले के सभी को दुलहे का बाप बरात में चलने का व्‍यक्तिगत रूप से निवदन करता है । फरे के रोज बरात चढ़ती है, मगर दूर का मामला है तो पहले भी बरात को रवाना होना पड़ता है । मेहमानों तथा बरात में चलने वालों को बरात रवाना होने से पहले दुलहे का बाप अपने घर खाना खिलाता है । हलवा, लापसी या विशेष भोजन खिलाया जाता है । बारात चढ़ने से पहले दुलहे को चौक में पाट पर बिठाया जाता है । औरतें गीत गाती हैं । दुलहे के ऊपर नये कपड़े के चारों कोनों में मूंग, दूब, लाख तथा गुड़ डालते है तथा कपड़े के चारों तरफ कच्‍चा सूत लपेटते हैं । दुलहे के घी उतारा जाता है । घी उतारने में सिर से शुरू करके कन्‍धे, कमर, घुटनों, टखनों से पांवों के नाखूनों पर उतारा जाता है । घी उतारने के बाद पीठी की जाती है । पीठी करने के बाद स्‍नान करवाते हैं । स्‍नान सबसे पहले मां करवाती है । स्‍नान करवाने के बाद कच्‍चे सूत के धागों को हल्‍दी में रंग कर दुलहे को जनेऊ पहनाई जाती है । जनेऊ पहिनने के बाद दुलहा सांस, मदिरा का तब तक त्‍याग करता है जब तक शादी करके आने के बाद जनेऊ उतार नहीं लेता । शादी विवाह में जनऊ पहिनने का रिवाज रैगरों के अलावा राजपूत जाति में ही है अन्‍य जातियों में नहीं है । रैगरों का क्षत्रिय होने का यह एक पुखता प्रमाण है । ब्राह्मणों में जनेऊ पहिनना उनका जाति धर्म है । जनेऊ पहिनने के बाद दुलहे का सगा बड़ा जीजा दुले को हाथों में उठाकर विनायकजी के सामने लाकर बिठाता है । फिर दुलहे को शादी कपड़े पहिनाए जाते हैं । दुलहे के शादी के कपड़ों को वरी कहते हैं । पहले यह रिवाज था कि वरी लाने के लिए दुलहे का बाप अपने नजदीकि एक दो बुजुर्गों को लेकर बाजार या पास के शहर में जाकर खरीदते थे । दुलहे के साफा पहिनने का रिवाज है । साफ केसरिया या मोड़िया रंग का राजपूतों की तरह तीखा बांधा जाता है । दुलहा सफेद धोती और किसी रंग का कमीज पहिन सकता है । साफे पर पुर्रियें तथा कलंगियें लगाते हैं । दुलहा कपड़े पहिन कर तैयार हो जाता है तब पहले देवताओं को उनके स्‍थानों पर जाकर नारियल चढ़ाता है । देवत धोकने का यह रिवाज अब लगभग टूट चुका है मगर अपने इष्‍ट देव को नारियल आज भी चढ़ाते हैं । बारात चढ़ती है तब औरतें गीत गाती हैं और कपड़े का पर्दा तान कर दुलहे को घर से बाहर लाती है । ढोल बजता है । जब दुलहा रवाना होता है तब मां दुलहे को स्‍तनपान कराती है । यदि मां जीवित नहीं है तो दुलहे की बड़ी भोजाई स्‍तनपान कराती हैा इससे दो बाते स्‍पष्‍ट होती है । मां का स्‍पनपान कराने का आशय यह है कि बेटा मां का दूध लजा कर मत आना । बड़ी भोजाई का स्‍तनपान कराने का आशय यह है कि बड़ी भोजाई को मां के बराबर दर्जा दिया जाता है । दुलहा बैलगाड़ी, बस, ट्रेक्‍टर में बैठन के लिए चढ़ता है तो पांव के नीचे नारियल रख कर चढ़ता है । बरात चढ़ते वक्‍त बंदूकों से धमाके किए जाते हैं । बारात चढ़ते वक्‍त यह दृष्‍य ऐसा होता है जैसे कोई फौज हमला करने के लिए चढ़ाई कर रही हो । दुलहा बस या गाड़ी में चढ़ते वक्‍त जो नारियल पांवों के नीचे रखकर तोड़ता है उस नारियल के टुकडे़ बारात गंतव्‍य स्‍थान तक पहुंचाती है उसके बीच जहाँ-जहाँ चौराये या नदी नाले आते हैं वहाँ फेंकते जाते हैं । बारात दुलहन के गांव में पहुच जाती है और किसी मंदिर या सार्वजनिक स्‍थान पर जाकर ठहर जाति है । बारात में से एक आदमी दुलहन के घर पहुचकर बारात के आने की बधाई देता है । उससे बधूकड़िया कहते हैं । बधूकड़िये को दुलहन का बाप नारियल देता है । शाम को बारात का स्‍वागत करने की तैयार कर दी जाती है । दुलहा और बाराती सज धज कर तैयार होते हैं । दुलहन का बाप मोहल्‍ले या धड़े वालो को इकट्ठा करता है । दुलहन पक्ष के लोग जिनकों मांड कहते है बारात का स्‍वागत करने के लिए रवाना होते हैं । आगे-आगे ढ़ोल बजता चलता है । पीछे औरतें गीत गाती चलती है । दुलहन पक्ष के लोग बारात के सामने पहुचते हैं । सबसे पहले दोनौं समधी गले मिलते हैं । इसे मिलनी कहते हैं । मिलनी में दुलहन का बाप अपने समधी को चारदर ओढ़ाता है तथा सामर्थ्‍य के अनुसार पैसे देता है । सुपारी, इलायची से बरातियों का सत्‍कार किया जाता है । बारातियों पर गुलाब डालते हैं । दुलहे की सास एक थाल मं जलता हुआ दीपक, काजल, कुंमकुंम, गुड़, एक रूपया कलदार तथा पानी का भरा कलश रखकर दुलहे को टीकने जाती है । सास कलदार रूपये से कुंमकुंम का दुलहे की ललाट पर टीका लगाती है । दुलहे के मुंह में गुड़ देती है और कलश से आरती उतारती है । सास थाल दुलहे के सामने छोड़ आती है । दुलहा थाल में सवा रूपया डालता है और थाल वापस लोटा दिया जाता है । इस समय औरतें अपने सगों और बारातियों को गीतों के जरिये मीठी गालियाँ सुनाती हैं । थाल लौटाने के बाद औरतें दुलहन के घर के दरवाजें पर पहुँच जाती है । दुलहा अपने जीजा के साथ तोरण पर जाता है । सबसे आगे एक कुंवारी लड़की बड़बेला सिर पर उठाए खड़ी होती है । उसमे दुलहा सवा रूपया डालता है । इसके बाद दुलहा तलवार से तोरण वांदता है । औरतें गीत गाती हैं । तोरण वांदने की रस्‍म पूरी होने के बाद औरतें घर में चली जाती है और दुलहा वापस अपनी बारात में जाकर बैठ जाता है । दुलहन पक्ष के पंच बारात के सामने बैठ कर लागभाग देते लेते हैं । पहले बेटी का बाप बेटे के बाप से पैसे लेता था । जिसे व्‍यवहार लेना कहते थे, मगर अब यह रिवाज उठ गया है । अब बेटी का बाप बिना पैसे लिए बेटी का विवाह करता है जिसे धर्म विवाह कहते हैं । रैगरों में धर्म विवाह की प्रथा है । लागभाग का लेन देन पूरा होने के बाद बारात को ढ़ोल बजाते हुए दुलहन का बाप अपने घर लाता है । दुलहन का बाप बारत वालों को उनके ठहरने का स्‍थान बता देता है जिसे जनवासा या डेरा कहते हैं । बारात दुलहन के घर पहुँचते ही बारातियों का खाना खिला दिया जाता है । दुलहा भी खाना खा लेता हैं । खाना खाकर बाराती जनवासा चले जाते हैं । वहाँ उनके ठहरने की व्‍यवस्‍था होती है ।

 

       कनाल - मांड में दुलहन के सगे भाई, बहिन, माँ, बाप, मामा, मामी, बुआ वगैरा फेरे होने के बाद खाना खाते हैं । इस रस्‍म को कनाल कहते हैं ।

 

       पडला - बारात के खाना खाने के बाद दुलहन पक्ष वाले पडला मांगते है । फेरों के वक्‍त दुलहे के घर से लाये कपड़ों को पहिन कर ही दुलहन फेरे लेती है । पडले में दुलहन के कपड़े - लहंगा, ब्‍लाउज, ओरना (साड़ी) एवम् श्रृंगार का सामान - कांच, कंगा, टीकी, नेल-पोलिस, लिपस्टिक, काजल की डिब्‍बी, रिबन वगैरा एक थाल में भरे पतासे और खारकों के उपर रखे जाते हैं । दुलहन के बांधने का मोड़ तथा पावभर मूंग भी रखे जाते हैं । इसके अलावा बबूल की छाल, लकड़ी की दो डिब्बियाँ, खजड़ी के गटुकडें तथा आंधा झाड़ा के सीकें भी रखी जाती है । पडला दुलहन के घर पहुँचते ही दुलहन को तैयार करते हैं । सबसे पहले घी उतारते हैं । घी उतारने का वही तरिका है जो दुलहे का होता है । घी उतारने के बाद पीठी करके स्‍नान करवाया जाता है । दुलहन पडले में लाये कपड़े पहिन कर श्रृंगार करती है । तैयार होकर दुलहन विनायकजी के सामने बैठ जाती है । मोड़ बांध दिया जाता है । दुलहा आता है और दुलहन के दायीं तरफ बैठ जाता है । दुलहे का जीजा या दुलहन की बहिन पल्‍ला छेड़ी बांध देते हैं । पल्‍ला छेड़ी एक लम्‍बा सफेद कपड़ा होता है जो दुल्‍हे के घर से लाया जाता है । इस कपडे़ के दोनों सिरों को हल्‍दी से पीला रंगा जाता है । दुलहे का जीजा दुलहे की पीठ पर हल्‍की-सी थपकी मारता है । यह उठकर खड़े होने का संकेत होता है । दुलहा खड़ा हो जाता है । दुलहन भी खड़ी जाती है । दुलहा आगे तथा दुलहन पीछे धीरे-धीर चलकर चंवरी में आकर बैठ जाते हैं । दुलहन-दुलहे के बाये तरफ बैठती है ।

 

Phare

       फेरे - फेरे लगने से पहले दुलहन का मामा एक सफेद कपड़ा लाकर दुलहन को ओढ़ाता है । चंवरी में हवन कुण्‍ड बना हुआ होता है । हवन कुण्‍ड के चारों कोनों में गलाबी रंग की चार खुंटियाँ लगी हुई होती है और उनके चारों तरफ मोली (कच्‍चा सूत) लपेटी होती है । थाम्‍भ चंवरी के पास खड़ा किया जाता है । ब्राह्मण दुलहा-दुलहन से हवन करवाता है । रैगरों में विवाह गौड़ ब्राह्मण करवाते हैं जो भाकरोटा जिला जयपुर से आते हैं । विवाह में पहले दुलहन का बाप दुलहे के दायीं हाथ की हथेली में मेंहन्‍दी लगाकर हाथ पीले करता है फिर हाथ पीले करने के बाद ब्राह्मण हथलेवा जुड़वाता है । हथलेवा में दुलहा दुलहन के मेंहन्‍दी लगे दायें हाथों की हथेलियों को एक-दूसरे के उपर रखकर रूमाल या कपड़े से बांध देता है । हथलेवा में दुलहे का हाथ उपर तथा दुलहन का हाथ नीचे रखा जाता हैं । फिर दुलहा दुलहन को खड़ा कर ब्राह्मण फेरे दिलवाता है । औरतें फेरों के गीत गाती है । फेरे थाम्‍भ और हवन कुण्‍ड के चारों तरफ दिलवाये जाते हैं । फेरों में पहले दुल्‍हन आगे रहकर चार फेरे लेती है । दुल्‍हन के चार फेरे पूरे होते ही दुल्‍हे को आगे करके तीन फेरे और दिलवाये जाते हैं । इस तरह रैगरों में सात फेरों से अग्नि की साक्षी में विवाह होता है । फेरे खत्‍म होते ही दुलहा-दुलहन को वापस चंवरी में बिठा दिया जाता है और ब्राह्मण हथलेवा खोल देता है । दुलहन का बाप श्रद्धानुसार ब्राह्मण को हथलेवा खोलने का दान देता है । इसके बाद दुलहा-दुलहन को देवस्‍थान के सामने ले जाकर बिठा दिया जाता है । पल्‍ला छेड़ी खोल दी जाती है । पल्‍ला छेड़ी दुलहन की बहिन या दुलहे का जीजा खोलता है । Mang Bharai इसके बाद कांसा पलटने की रस्‍म होती है । दो कांसी की थालियों में भोजन परोस कर लाते हैं । एक थाली दुलहन के सामने तथा दूसरी दुलहे के सामने रखी जाती है । रस्‍म के अनुसार दुलहा अपने सामने की थाली दुलहन के सामने तथा दुलहन अपने सामने की थाली दुलहे के सामने रखती है । इसे कांसा पलटना कहते हैं । दुलहा-दुलहन देव स्‍थान के सामने से उठ जाते हैं । घर के चौक में दोनों दूरी पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो जाते है और दोनों के बीच कपड़े का पर्दा खींच दिया जाता है । दुलहा तथा दुलहन अपने हाथों में आका मूंग लेकर एक-दूसरे पर जोर से फैंकते है । फिर दुलहा जनवासा चला जाता है ।

 

       पग धोवाई - दहेज देने की रस्‍म को पग धोवाई कहते हैं । रैगर जाति में दुलहे का बाप दहेज के लिए न तो पहले से ही कोई शर्तें रखता है और न दहेज मांगता है । दुलहन का बाप अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार दहेज देता है । इतना अवश्‍य है कि हर बेटी का बाप अपनी सामर्थ्‍य से भी ज्‍यादा दहेज देने की कोशिश करता है । इस रस्‍म में दुलहे को बुलाकर दुलहन के साथ पल्‍ला छेड़ी बांध कर खाट पर बिठा दिया जाता है । दुलहे को उसी खाट पर बिठाया जाता है जिस खाट को दहेज में दिया जाता है । दुलहन को खाट के पास रखे पाट पर बिठाया जाता है । दुलहन दुलहे के बायीं तरफ बैठती है । बैठने के बाद दुलहन के मामा का दिया हुआ एक सफेद कपड़ा दुलहा और दुलहन दोनों के पांवों पर डाल देते हैं । मिट्टी या पीतल के एक बर्तन में पानी डालकर उसमें हल्‍दी डाली जाती है । उसमें नीम की एक छोटी-सी टहनी रखी जाती है । दुलहन का बाप दुलहन को दिया जाने वाला सोने-चांदी का जेवर एक थाल में डालकर दलहे के हाथ में रख देता है । थाल में जवर के अलावा कुंमकुंम तथा दहेज में दिया जाने वाला लोटा रखा जाता है । दुलहन के नजदीकी रिश्‍तेदार बारी-बारी से आते हैं और दहेज में जेवर या पैसे देने होते हैं वो थाली में डालते जाते हैं तथा थाली में रखे कुंमकुंम से दुलहे के ललाट पर टीका तथा दुलहन के मोंड़ पर तिलक करते हुए नीम के झवरे (टहनी) से दुलहा तथा दुलहन के पांवों पर हल्‍दी के पीले पानी से छींटे डालते हैं । दुलहन के सभी रिश्‍तेदार पग धोवाई कर लेने के बाद दुलहन का जीजा दुलहे के हाथ में रखी थाली को लाकर पंचों के सामने रखता है । दुलहा दुलहन उठ कर जनवासा चले जाते हैं । ढोल बजता है तथा औरतें गीत गाती हुई दुलहा दुलहन को जनवासा पहुंचाती है । पंच दहेज में दिए गए सोना, चांदी के जेवर, फर्निचर, कपड़ों, बर्तनों आदि तमाम चीजों की कीमत आंकते हैं । फिर थाली जनवासा पहुंचा दी जाती है । थाली दुलहन का जीजा पहुंचाता है । बरात वाले दहेज की कीमत आंकते हैं । जनवासा में नाचगान होने के बाद दुलहन औरतों के साथ वापस अपने घर आ जाती है ।

 

       जान पछेवड़ी - इसे जान पहरानी या जान ओडाणी भी कहते है । पगधोवाई के बाद दुलहन का बाप बरातियों को अपने घर बुलाकर जान पछेवड़ी करता है । दुलहन का बाप प्रत्‍येक बराती को अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े, बर्तन या पैसे देता है । इस समय दुलहा एवम् उसके पिता व परिवार के सदस्‍यों को दूसरे बरातियों की तुलना में अच्‍छे कपड़े करने का रिवाज है । जान पछेवड़ी के बाद दुलहन का बाप अपनी बेटी को विदा कर देता है । औरतें बिदाई के गीत गाती हैं । बरात की विदाई के वक्‍त दुलहन के बाप के घर से केसरिया या गुलाबी रंग सभी बारातियों पर डालते हैं । बरात दुलहन को लेकर अपने घर पहुँचती है । बराती सभी अपने घरों में चले जाते हैं । मगर दुलहा और दुलहन अपने मोहल्‍ले में बने मंदिर या पड़ौस के घर में जाकर बैठ जाते हैं । दुलहे के घर से औरतें ढोल ढमाके के साथ गीत गाती हुई आती है । दुलहे की मां एक थाल में पानी भरा कलश, कुंमकुंम, गुड़, चावल, कलदार रूपया लेकर जाती है । दुलहा-दुलहन पल्‍ला-छेड़ी बांधे हुए खड़े होते हैं । दुलहे की मां अपने लाडले बेटे को कलदार रूपये से कुंमकुंम का टीका लगाती है तथा दुलहा व दुलहन के मुंह में गुड़ देती है । कलश से दोनों की आरती उतारती है । ढोल बजाते हुए नाच गानों के साथ दुलहा-दुलहन को अपने घर लाते हैं ।

 

       बार रूकवाई - रस्‍म रिवाज के अनुसार घर के चौक में चौका देकर गेरूं तथा चुना व कली से स्‍वास्‍तिक बनाया है । दुलहा दुलहन के पांव बनाये जाते हैं । इन पांवों पर दुलहा दुलहन को खड़ा किया जाता है । दुलहन दुलहे के बायीं तरफ खड़ी रहती है । दुलहे की बहिनें तथा बुआ वगैरा उनके सामने खड़ी होकर शादि के बाद प्रथम बार घर में प्रवेश करने की खुशी के उपलक्ष्‍य में पैसों की मांग करती है । दुलहे का बाप अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार पैसे देता है तब दुलहा दुलहन को घर में जाने देते हैं । इस रस्‍म को बार रूकवाई कहते है । दुलहा दुलहन विनायकजी के सामने जाकर बेठ जाते हैं तथा पल्‍ला-छेड़ी खोल देते हैं । दुलहा दुलहन अपने से बड़ो के चरण स्‍पर्ष कर आर्शिवाद लेते हैं । रात को रातिजगा होता है जिसमें मोहल्‍ले की सारी औरतें इकट्ठी होकर पूरी रात गीत गाती है । रातिजगा में रात भर दीपक जलाया जाता है । दूसरे दिन सुबह मोहल्‍ले की औरतों के साथ दुलहा दुलहन देवत धोकने जाते है । इसे जातें देना भी कहते हैं । आजकल यह रिवाज प्राय: खत्‍म हो गया है । इसके बाद अन्‍य जातियों की तरह सुहागरात की रस्‍म होती है ।

 

       गोणा - इसे मुकलावा भी कहते हैं । विवाह के एक साल बाद गोणा किया जाता है । लड़का लड़की बड़ी हो तो साल भर से भी पहले गोणा कर दिया जाता है । गोणा में पति अपने एक दो साथियों के साथ ससुराल जाता है । शादि के बाद प्रथम बार दुलहे का ससुराल जाना होता है । ससुराल वाले अपने दामाद तथा उसके परिवार वालो को अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े देते हैं । पति अपनी पत्‍नि को लेकर घर आ जाता है ।

 

       जांमणा - लड़की का बाप चाहे कितना ही गरीब हो मगर अपनी लड़की की पहली डीलिवरी अपने घर पर ही लाकर करवाता है । इसका सारा खर्चा लड़की का बाप ही उठाता है । पहला बच्‍चा होने के बाद पति अपनी पत्नि को लेने ससुराल आता है तब ससुर अपने दामाद तथा संमधी वगैरा को कपड़े करता है । जांमणा में लड़की का बाप अपनी लड़की को कपड़े तथा बच्‍चे को पालना तथा छोटा मोटा सोने-चांदी का जेवर पहिनाता है । यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्‍लेखनिय है कि पहला बच्‍चा होने के बाद लड़की अपने ससुराल आती है तब अपनी सास, ननद, जेठाणियों तथा देराणियों के लिए सूंठ के लड्डू जो स्‍वयं ने जापे में खाये हैं उसी में से बचाकर लाकर बांटती है ।

 

       मायरा - इस रस्‍म को मामेरा भी कहते हैं । भाई अपनी बहिन की लड़की (भांजी) के विवाह के मोके पर मायरा लाता है । अपनी लड़़की की शादी के मोके पर बहिन अपने भाई को देने के लिए शादी की पत्रिका (कार्ड) के साथ गुड़ की एक भेली ले जाती है । इस रस्‍म को बत्‍तीसी लाना कहते हैं । बहिन बत्‍तीसी लाती है तब भाई मोहल्‍ले के को इकट्ठा करके गुड़ की भेली ले लेता है । इसका स्‍पष्‍ट संकेत होता है कि भाई मायरा जरूर लायेगा । बहिन बत्‍तीसी लाती है और भाई लेने की स्‍थ‍िति में नहीं होता है तो इंकार कर देता है । बहिन अपने भाई को मायरा लाने के लिए अपने मुंह से कभी नहीं कहती है मगर विवाह में आने का निमंत्रय अवश्‍य देती है । बत्‍तीसी लेने के बाद मामा अपनी भांजी के विवाह के रोज अपने नजदीक रिश्‍तेदारों के साथ वहाँ पहुँच जाता है । मायरा में औरते जरूर आती है । औरतें मायरा के गीत गाती हुई जाती है । ये वहाँ पहुँच कर मोहल्‍ले के मंदिर या फलसे पर जाकर बैठ जाते हैं । बहिन को सूचना मिलने पर मोहल्‍ले के आदमियों और औरतों के साथ ढोल बजाते हुए, गीत गाते हुए स्‍वागत के लिए जाती है । ब‍हनोई (बहिन का पति) एक परात में गेहूँ का दलिया जिस पर गुड़ की एक भेली रखकर ले जाता है तथा बहिन एक थाल में कुंमकुंम, चावल, गुड़ तथा पानी से भरा कलश ले जाती है । बहिन अपने भाई तथा उसके साथ आने वालों के कुंमकुंम से तिलक करती है । बहनोई दलिया व गुड़ से भरी परात मायरा वालों को सोंप देता है । इसे वापस बहनोई के घर पहुँचा दी जाती है । बहिन बाप व भाईयों के मुंह में गुड़ देती है तथा आरती उतरती है । मायरा में आने वालों को बहिन की तरफ से प्रत्‍येक को एक एक चोटी वाला नारियल दिया जाता है । इस मौके पर भाई अपनी बहिन तथा बहनोई को सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े और पैसे देता है । बहिन अपनी माँ तथा अन्‍य औरतों के गले मिलती है । फिर ढोल बजाते हुए मायरा वालों को बहिन अपने घर लाती है । बहिन के घर से थाल मंगवाकर भाई उसमें पैसे तथा जेवर रखता है । पंच लोग उसकी कीमत आंकते हैं । पैसों व जेवर सहित थाल बहिन के परिवार वालों को सोंप दिया जाता है । बहिन के सास, ससुर तथा उसके परिवार को कपड़े ओडाये जाते हैं । मायरा ओडने के बाद बहिन एक समय का भाई को खाना खिलाती है जिसे मामा भात कहते हैं । बारात जाने के बाद मायरा को भी रवाना कर दिया जाता है ।

 

       गंगा प्रसादी - इसे मृत्‍यु भोज भी कहते हैं । मरने के 12 दिन के अंदर मृतक की ओलाद अपने पूर्वजों की अस्थियें लेकर हरिद्वार जाकर प्रवाहित करता है । तथा वापस आते समय गंगा जल की झारी लाता है । मुंडन करवा कर आते हैं । गले में गंगा जी की माला पहिन कर आता है तथा हाथ में बेत की लाठी लाता है । हरिद्वार से वापस आने पर गंगा जल को ढोल बजाकर गीत गाते हुए घर लाते हैं । उस रात रातिजगा होता है जिसे 'रात डांगड़ी' कहते हैं । दूसरे दिन औरतें गंगा जल की झारी सिर पर उठाकर ढोल ढमाके के साथ पथवारी पर जाती है । हरिद्वार जाते वक्‍त अनाज के दाने मिट्टी की कुंडियों में डालकर जाते है जो वापस आने तक उग जाते है । इसे पथवारी कहते हैं । पथवारी घर से थोड़ा दूर पिपल, बड़ या नीम के पेड़ के नीचे बनाई जाती है । पथवारी की पूजा करके उस पर एक लाल कपड़ा डाल देते हैं । पथवारी पूजन करके वापस आकर हवन कुंड जो घर के चौक में या बाहर बना हुआ होता है, उसके पास बैठ जाते हैं । ब्राह्मण हवन करवाता है । हवन में मृतक के बेटे, पोते सपत्निक बैठते हैं । हवन के बाद गंगा जल की झारी ब्राह्मण खोलता है । उस समय सभी उपस्थित लोग गंगा माता की जय जय कार करते हैं । ब्राह्मण पवित्र गंगा जल को उपस्थित सभी पर फैंकता है । गंगा प्रसादी के मौके पर मृतक के सभी रिश्‍तेदार आते हैं । हरिद्वार से कंठी मखाणा लाते हैं । जिसे प्रसाद के रूप में सभी रिश्‍तेदारों तथा मोहल्‍ले वालों में बांटते हैं । मृतक के रिश्‍तेदार कपड़े लाते हैं । जो संबंधित को ओडाकर चले जाते हैं ।

 

      मृत्‍यु संसकार - पहले जालाणी जाति रैगरों के मृत्‍यु संसकार करवाती थी मगर अब उन्‍होंने अपना परम्‍परागत धंधा छोड़ दिया है । रैगरों में भी मृत्‍यु संसकार अन्‍य हिन्‍दु जातियों की तरह ही होता है । रैगरों में शव को जलाने की प्रथा है ।

 

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत 'रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति')

 

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