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Samaj sudhar
Social and community Problems

     आज लोकतन्‍त्र का जमाना है, इसमें संख्‍या बल का मूल्‍य होता है । देखा जाए तो स्‍वतन्‍त्रता प्राप्‍ति के बाद अनुसूचित जातियों को जो वांछित लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिला । आजादी के पेसठ वर्ष बीत गए है, लेकिन गरीबी और जहालत भरी जिन्‍दगी से छुटकारा नहीं मिला, दु:ख भरी जिन्‍दगी से ही पीछा नहीं छूटा, सुख-सम्‍पन्‍नता तो दूर की बात है । डॉ. अम्‍बेडकर का कथन ''हमें शासक बना है'' साकार होने की दिशा में पहल जरूर दिखाई देने लगी है । यह उल्‍लेखनीय तथ्‍य है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद रैगर अपना अस्तित्‍व बचाने के लिए आदिकाल से ही आन्‍दोलित रहा है, हालांकि वर्णवादियों ने उसे पीछे ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन रैगर जाति की साहसिकता आज भी बरकरार है और दुनिया में होने वाले परिवर्तनों से अप्रभावित नहीं है अंधकार से प्रकाश की ओर उन्‍मुख है । लेकिन इसके साथ यह बात भी सत्‍य है कि वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था में सबसे नीचे के पायदान पर होने के कारण हम सदियों से दमन का शिकार होते आ रहे हैं । आज हमारे समाज में इसी पीछड़ेपन के कारण अनेक ज्‍वलंत समस्‍याएँ पैदा हुई है । वैश्‍वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के चलते सार्वजनिक उद्योगों एवं शिक्षा के निजीकरण की नीति को बढ़ावा देने से अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के विकास का पहिया रूक गया है, जो थोड़ी-सी बराबरी और खुशहाली का अहसास उसे होने लगा था, वह फिर डगमगा गया है । जिन लोगों ने गरीबी झेलते हुए बड़ी मुश्‍किल से अपने बच्‍चों को पढ़ाया-लिखाया, उनके लिए शिक्षा बेमानी हो गई है ।

      अनुसूचित जाति समाज के दूसरे समुदायों की अपेक्षा संख्‍या बल, बुद्धि बल और कर्मठता के बावजूद रैगर समाज आशा के अनुरूप प्रगति की ओर आरूढ़ नहीं हो पाया । नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान के अन्‍तर्गत कुछ लोगों को सरकारी नौकरी के अवसर भी मिले, हालांकि इस सुविधा का लाभ पाने वाले एक प्रतिशत से भी कम हैं और उन्‍हीं के जीवन में थोड़ी-सी बेहतरी और खुशहाली आ पाई है, जिसे देखकर दूसरे लोग ईर्ष्‍यावश कहने भी लगें कि इन्‍हें आरक्षण की जरूरत नहीं है । परन्‍तु गाँव-देहात और कस्‍बों में स्थिति जस-की-तस है और कहीं-कहीं तो पहले से भी अधिक बदतर हो गई है । इस समय की ज्‍वलंत समस्‍याएँ इस प्रकार है -

 

अशिक्षित होना -

      शिक्षा का अभाव होना रैगरों की अवनति का एक महत्‍वपूर्ण कारण है । पहले इनके लिए हिन्‍दू शास्‍त्रों के अनुसार शिक्षा विधान ही नहीं था, लेकिन बीसवी सदी में महात्‍मा ज्‍योतिबा फुले जैसे समाज-सुधारक की वहज से उनके लिए‍ शिक्षा के द्वार खुले, लेकिन उसका लाभ तो बहुत गिने-चुने लोगों को ही मिल पाया और आजादी के बाद सरकार की ओर से जो प्रयास किये गए, उसकी भी पहुँच सक्रिय रूप से बहुत नीचे तक नहीं हो पाई, क्‍योंकि जिनके हाथों में शिक्षा के विस्‍तार कार्यक्रमों के अनुपालन का उत्तरदायित्‍व है, वे इन्‍हें बराबरी में नहीं लाना चाहते ।

      वैसे दूसरों की देखादेखी थोड़ी-सी दूर की सूझबूझ रखने वाले जाति के लोगों की तरफ से जो प्रयास हुए हैं, वे भी नाकाफी है, लेकिन विकास का पहिया चल जरूर पड़ा है और शिक्षा के निजीकरण से जिस प्रकार शिक्षा महंगी होती जा रही है, इससे विकास की रफ्तार फिर से कम होने की संभावना बन रही है इस कमी को पूरा करने के लिए रैगर जाति के शिक्षित और सम्‍पन्‍न लोगों को सामूहिक प्रयास करने होंगे ।

 

नशा -

      आज हमारे समाज में ही नहीं पूरे देश में नशे का बोलबाला है । नशा एक अभिशाप है । नशा एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है । शराब, गांजा, तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और भांग सहित हर प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन जानलेवा हो सकता है । नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ ही व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाता है । नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है । इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी बढ़ जाता है और व्यक्ति शारीरिक-मानसिक रूप से अपंग हो जाता है । इस दुर्व्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग और विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे है । इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है ।

      हमारे रैगर समाज में भी इसका चलन है ओर हमे चाहिए कि इस नशे के रोग से दूर रहे इसी में हमारी, परिवार, समाज और देश की भलाई है । और अंत में मेरी ये गुजारिश है कि अपने को छोड़कर एकबारगी अपने परिवार, माता, पिता, पत्नी और बच्चों का ख्याल रखते हुए ये सोचना होगा कि कल होकर आपको कुछ हो जाता है तो उनको कितना कष्ट होगा जो पूरी तरह आप पर ही आश्रित हैं । अगर आपको उनसे वास्तव में प्यार हैं । तो आपके परिवार वालों को ये न सुनना पड़े कि आप तो कुछ दिन के ही मेहमान हैं । आपका इलाज संभव नहीं है । आपके परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या ऑपरेशन से भी ठीक नहीं होगा ? तो डॉक्टर का जवाब आता है कि कहाँ-कहाँ ऑपरेशन करेंगे पूरा शरीर खोखला हो गया है । आइये प्रण करें कि जहाँ तक संभव होगा लोगों को नशे के सेवन करने से रोकेंगे ।

 

अंधविश्‍वास -

      रैगर जाति के लोगों में जो अंधविश्‍वास सदियों से चले आ रहे हैं, वे अभी भी बरकरार हैं । मानसिक दासता से उबरने में अभी वक्‍त लगेगा । भूत-प्रेत, जादू-टोना में विश्‍वास बराबर बना हुआ है । मृतक की मुक्ति के लिए बड़ा भोज दिया जाता है, चाहे पैसा कहीं से कर्ज में ही क्‍यों न उठाना पड़े । तेरहवीं तो अभी भी बड़े पैमाने पर प्रचलित हैं । वैसे शिक्षित समाज तो इस प्रकार के अंधविश्‍वासों से दूर होता जा रहा है, जो अच्‍छा लक्षण है, लेकिन 90 प्रतिशत से अधिक आबादी तो इस प्रकार के अंधविश्‍वासों में ग्रस्‍त है और खून-पसीने की अपनी कमाई को व्‍यर्थ में बर्बाद कर रही है । ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति हद से ज्‍यादा बत्‍तर है, वे खून-पसिना एक कर इतनी कड़ी मेहनत से दिन-रात एक कर पैसा कमाते हैं ओर इन अंधविश्‍वासों में फसकर इस कड़ी मेहतन के पैसे को बर्बाद कर देते हैं ।

 

फिजूलखर्ची -

      यह बहुत ही दु:खद पहल है कि जिन्‍हें कमरतोड़ मेहनत के बाद आधी अधूरी मजदूरी मिलती है, लेकिन वे दूसरों की देखादेखी शादी-विवाह, जन्‍म-मृत्‍यु तथा तीज-त्‍योहारों के अवसर पर दिल खोलकर खर्चा करते हैं, जिससे उन पर अतिरिक्‍त बोझ पड़ता है । यह निश्चित है कि उन्‍हें कर्ज पर जरूर पैसे उठाने पड़ते हैं ओर इनके लिए कर्ज की दरें भी महंगी होती है, उसे सूद सहित चुकान में होने वाली परेशानियों को वह नजरअंदाज कर जाते हैं ओर इस कारण जीवन के दूसरे जरूरी काम अटक जाते हैं । आज जमाना बदल रहा है, तरक्‍की के नए-नए प्रमिान विकसित हो रहे हैं, इसलिए चाहे जैसा भी अवसर हो, अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार ही खर्च करना चाहिए, दूसरे की नकल नहीं करनी चाहिए और अपने जैसी स्थिति वालों के साथ ही संबंध बनाना अधिक उचित होगा, जिससे अपने ऊपर अनावश्‍यक बोझ न पड़े ।

 

गरीबी -

      आंकड़े चाहे भारत को कितना भी आर्थिक रूप से मजबूत दिखाएँ, विकास दर भले ही 10 प्रतिशत से भी ऊपर चली जाए, लेकिन 40 प्रतिशत से अधिक आबादी का मूलभूत सुविधाओं से वंचित होना अपने आप में बहुत ही दु:खद पहलू है । अमीरों की संख्‍या बढ़ेगी तो गरीबों की संख्‍या भी बढ़ेगी, उस पर रोक लगाने वाली छड़ी किसी के पास नहीं है ।

      इस गरीबी से कोई वर्ग और जाति अछूते नहीं है । लेकिन रैगर जाति की स्थिति इसलिए बहुत खराब है कि वह सामाजिक और आर्थिक पाबंदियों से अभी भी ग्रस्‍त है । वह अपने परम्‍परागत व्‍यवसाय को तिलांजलि देकर दूसरे कार्य की ओर अग्रसर हुआ, तो दूसरों ने उसे कहीं भी जमने नहीं दिया । खेती के अलावा कोई अन्‍य कार्य करने का उसे न तो कोई अनुभव है और न ही उसके पास कोई पूंजी है, ओर खेती करने के लिए पर्याप्‍त मात्रा में जमीन नहीं है । कोई दूसरा उसे सहारा एवं सहयोग नहीं देना चाहता ।

      काम-धंधों के बारे में सरकार की जितनी भी योजनाएं है, उनकी उसे जानकारी नहीं है । यदि इस भयंकर गरीबी से निकलने की समय रहते पहल नहीं की गई, तो भूख और बीमारी से दम तोड़ने वालों की संख्‍या बढ़ती ही जाएगी । इसलिए गांव के शिक्षित बेरोजगार लोगों को ग्राम स्‍तर पर स्‍वयं सहायता समूह बनाकर सहकारिता के आधार पर कुटीर उद्योगों की शुरूआत करनी होगी । कोशिश करेंगे तो आगे का नेटवर्क भी सुलभ हो जाएगा ।

 

बेरोजगारी -

      कहने को तो सारी दुनिया में मंदी छाई है, भारत भी इससे अछूता नहीं है, यहां भी बेरोजगारों की संख्‍या बढ़ती जा रही है । सरकारी प्रयासों के बावजूद इस पर नियंत्रण पाना कठिन हो रहा है । बहुत बाद में यहाँ पर व्‍यवसायिक प्रशिक्षण की और रुझान बढ़ा है । फिर इस दिशा में जो योजनाएं चल रही है, वे देश की आबादी के हिसाब से ना काफी है । रैगर बिरादरी के लोग इसमें भी पीछे हैं । ये नौकरी या मजदूरी के अलावा किसी भी कार्य को करने में शर्म महसूस करते है । गांव में जो कार्य संभव नहीं, उसके लिए शहर या बड़े कस्‍बे में कोशिश करनी चाहिए । सरकारी नौकरी या आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न लोग मिल-जुलकर व्‍यवसायिक प्रशिक्षण केन्‍द्र शुरू करें, तो रोजगार बढ़ने की गुंजाइश हो सकती है । आज के युवाओं को व्‍यवसायिक शिक्षा की ओर ध्‍यान देना चाहिए ताकि नौकरी ना मिलने पर भी उस शिक्षा से प्राप्‍त अनुभव के द्वारा घर पर कार्य किया जा सके ।

 

राजनीति में भागीदारी न होना -

      हमारे समाज की राजनीति व सत्ता में भागीदारी बहुत ही कम है । इस कमी के कारण हमारे अनेक आवश्‍यक कार्य भी नहीं होते और हम मुंह ताकते ही रह जाते है । अत: अधिक से अधिक लोगों को राजनीति में भी जाना चाहिये । आप अपनी पसन्‍द की किसी भी पार्टी में सम्मिलित होकर कार्य करें । यदि आप ठोस कार्यकर्त्ता होंगे तो पार्टी आपको चुनाव में टिकिट भी देगी । वैसे मात्र चुनाव में समय टिकिट मांगने पर कोई नहीं देता । चुनाव के समय वैसे ही टिकिट मांगते व एक दूसरे की टांग खींचने कारण हमारी शक्ति क्षीण ही होती है । हमारी जाति के कई योग्‍य व्‍यक्ति चुनाव के समय ही पार्टियों से टिकिट मांगते हैं, जिन्‍हें नहीं मिलता । ऐसे लोग पहले से ही किसी भी पार्टी में जाकर सक्रिय कार्य करें तभी टिकिट व सफलता मिलेगी ।

      हमें ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक सभी क्षेत्रों के चुनावों में अधिक से अधिक भाग लेना चाहिए एवम् समाज संगठन के माध्‍यम से एक पद के लिए मिलकर एक ही उम्‍मीदवार खड़ा करना चाहिये ताकि वोटों का बंटवारा न होने से हमारे उम्‍मीदवार की जीत सुनिश्चित हो जाये । प्राय: पंचायत चुनावों में यह देखा गया है कि एक सीट के लिए कई जाति बन्‍धु खडे हो जाने से हमारी 75% आबादी होने पर भी हमारे उम्‍मीदवार हार जाते है । हमारे कार्यकर्त्ताओं व राजनेताओं को इस ओर विशेष ध्‍यान देना चाहिये ।

 

समर्पित नेतृत्‍व -

      दूसरों के मुकाबले रैगर जाति के नेताओं के बारे में यह बात ज्‍यादा सुनने को मिलती है कि पार्षद, विधायक अथवा सांसद बनने के बाद वह अपने लोगों से मिलना-जुलना एकदम कम कर देता है, अनय वर्गों के लोगों के साथ उसका बहेतर तालमेल होता है और उसके अधिकार क्षेत्र में जो कार्य अथवा योजनाएँ होती हैं, उनका लाभ भी गैर जाति के लोगों केा पहले और अधिक मात्रा में उपलब्‍ध कराता है, भले ही संख्‍या की दृष्टि से वे कम हो । इसके अलावा कुछ लोग अच्‍छे भी है जो जाति के बारे में सोचते है ।

      इस तथ्‍य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वह जिस क्षेत्र का प्रतिनिधि है, सबकी तरफ ध्‍यान देना उसका दायित्‍व है, लेकिन जाति के बहुसंख्‍यक लोगों को दरकिनार करना भी अच्‍छी बात नहीं । कई नेताओं की शिकायत यह रहती है कि अपने लोग उन्‍हें उचित सम्‍मान नहीं देते । यदि कहीं ऐसी बात है तो उसे भी सुधारना चाहिए ।

      वैसे तो आज के समय में राजनीति एक व्‍यवसाय बन गया है और छोटे-मोटे चुनाव में ही लाखों रूपये खर्च हो जाते हैं । इस प्रकार समाज के प्रति लगाव रखने वाले लोग इस क्षेत्र से ही बाहर हो जाते हैं, क्‍योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि चुनाव आधुनिक तरीके से लड़ सके । फिर जो इस क्षेत्र में आता है तो वह कमाने के लिए ही आता है, इसलिए वह पहले अपना पेट भरे की सोचता है और अगले चुनाव के लिए बन्‍दोबस्‍त करना चाहता है, लेकिन जिन बाबा साहब ने जन-प्रतिनिधि में आरक्षण की व्‍यवस्‍था को विधि-सम्‍मत बनाया है, उसकी Pay Back to Society वाली नसीहत को भी ध्‍यान रखना चाहिए और समाज को गरीबों की बेहतरी के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम करना चाहिए तथ बीच-बीच में मिलने-जुलने की प्रक्रिया से भी अपने लोगों का हौंसला बढ़ता है ।

 

पारिवारिक विघटन -

      पाश्‍यात्‍य प्रभाव से पूरा भारतीय समाज ही त्रस्‍त है और संयुक्‍त परिवार टूट रहे है । माता-पिता के प्रति लापरवाही आम बात हो गई । अधिक स्‍वच्‍छंदता ने पति-पत्‍नी के रिश्‍तों में भी दरार पैदा कर दी है । बड़ों की अनुभव युक्‍त सलाह को महत्‍व देने की बात तो अलग है, उसे सनुना ही गंवारा नहीं समझा जाता है । हमारे प्राचीन ग्रंथों में वृद्धजनों को बहुत महत्व दिया गया है । उनको समाज की संचित निधि कहा गया है । वे समाज के लिए धरोहर-सदृश रक्षणीय माने गए हैं । जब हम तुलना कर देखते हैं, तो पता चलता है कि दूसरों की बजाय हमारी जाति के परिवारों में उच्‍श्रृंखलता की भयावह स्थिति है । वहाँ फिर भी रिश्‍तों का और उम्र का लिहाज किया जाता है, शिक्षा की कद्र की जाती है और यदि नइ सबके अलावा भी किसी प्रकार की कुशलता है, तो उसे भी सम्‍मान की दृष्टि से देखा जाता है, उत्‍साहवर्धन भी किया जाता है तथा जरूरत पड़ने पर प्रेरणा एवं सहयोग भी प्रदान किया जाता है ।

      परिवार समाज की प्रारंभिक कड़ी है, जब यह मजबूत होती है, पारिवारिक अनुशासन होता है तो समाज भी एकजुट होता है और यह एकजुटता ही प्रगति का आधार है । जो बड़े-बड़े सम्‍मेलन, प्रदर्शन या रैलियां जातिगत बैनर तले देखी जाती हैं, उनका राज पारिवारिक अनुशासन ही है और इसका रैगर जाति में नितांत अभाव है । यदि अपने अस्तित्‍व की रक्षा करनी है, तो इस पर भी सोच-विचार करने की जरूरत है ।

 

सहकारिता का अभाव -

      जब मनु ने सम्‍पूर्ण शुद्र वर्ग के लिए पठन-पाठन की मनाही कर दी, तब मस्तिष्‍क तो स्‍वत: ही शिथिल हो गया, केवल सेवा के अधिकार से शरीर जरूर मजबूत रहा, क्‍योंकि कभी-भी कहीं-भी जाने और कोई भी कार्य करने का आदेश पालन करना जरूरी था । लेकिन आज तो दुनिया बहुत आगे निकल गई है । बड़े-से-बड़े उद्यम सहकारिता के आधार पर खड़े हैं । दूसरी जाति के लोग मिलजुल कर रोजगार के नए-नए विकल्‍प अपनाकर आर्थिक प्रगति की ओर अग्रसर हैं, लेकिन रैगर बंधु इसमें भी बहुत पीछे हैं, एक-दूसरे पर जरा भी विश्‍वास नहीं करते । जो आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न नहीं हो, ऐसी कौम के लिए तो सहकारिता के आधार पर उद्यमिता की ओर प्रयास करना सबसे अच्‍छा विकल्‍प है । अगर हमारी बात आप तक पहुँचती है, तो इस पर भी जरूर गौर करें ।

 

संवेदनहीनता -

      कई बार अपने लोगों की स्थिति पर विचार करते समय लगता है कि रैगर जाति के लोग तो अभी अपने प्रति भी संदेवनशील नहीं है । कोई अड़चन होती है, शरीर में दिक्‍कत होती है, तो उस पर फोरी तौर पर ध्‍यान देते हैं, थोड़ी राहत मिलते ही भूल जाते हैं । समाज के प्रति संवेदनशीलता का पाठ हम कब पढ़ेंगे, जबकि दूसरी जाति के लोग अपेन समाज के प्रति जागरूक हैं और तुरंत हरकत में आ जाते हैं । यदि उनके समाज के साथ गुजरात में कोई घटना होती है, तो राजस्‍थान और मध्‍य प्रदेश के लोग भी हरकत में आ जाते हैं और सहयोग के लिए तत्‍पर हो जाते हैं । हमें इस मामले में अन्‍यों से सीखने की जरूरत है ।

 

उत्‍पीड़न -

      वैसे तो सामन्‍ती मानसिकता और जातीय दंभ से ओत-प्रोत दंबग उच्‍च जातियों के ऊँची नाक वाले अपने यहाँ काम करने वाले मजदूरों तथा नीच समझी जाने वाली जाति के लोगों पर समय-समय पर अत्‍याचार करते ही रहते हैं, लेकिन जिन्‍होंने इसे नियति मान लिया है, वे विरोध नहीं करते, इसकी चर्चा गली-मुहल्‍लों तक ही सीमित रहकर अपने आप कुछ समय बाद समाप्‍त हो जाती है । लेकिन रैगर, जो विरोध करते हैं, गलत बात का जवाब देते हैं और जहाँ तक संभव होता है, मरने मारने पर उतारू भी हो जाते हैं, उसके इस मनोबल को तोड़ने के लिए उत्‍पीड़न की घटनाएँ दूसरों के मुकाबले ज्‍यादा होती है और पुलिस-प्रशासन भी उसका साथ नहीं दे पाता, क्‍योंकि उनकी महदर्दी भी वर्गीय सम्‍बन्‍धों के कारण उत्‍पीड़कों के साथ ही होती हैं । अपने ही जैसे हाड़-मांस के आदमी को जिन्‍दा जलाना कितना वीभत्‍स है, कितना क्रूर है, दूसरों की बहन-बेटी की इज्‍जत से खेलना कितना शर्मनाक है । मजदूर को उसकी मजदूरी के बदले मारना-पीटना कहां का न्‍याय है ? लेकिन उत्‍पीड़न का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है । उस पर विराम कौन लगाएगा, कैसे लगेगा ?

      मुसलमान का गाँव में एक घर भी होता है, तो उसे कोई छेड़ने की हिम्‍मत नहीं करता, क्‍योंकि उसकी हमदर्दी में सारे क्षेत्र के नहीं, पूरे देश के मुसलमान भाई खड़े नजर आते हैं । दूसरी तरफ रैगरों के 100 घर भी होंगे, उनका उत्‍पीड़न करने में किसी प्रकार का डर नहीं लगता है । उन्‍हें पता है कि पीड़ित के खानदान के भी सारे लोग उसके साथ खड़े नहीं होंगे । इस स्थिति में सुधार करना होगा, और दूसरों से भी सीखना होगा अन्‍यथा य समस्‍या यथावत बनी रहेगी, आँसू तथा कराहट घर की चारदीवारी की हद पार नहीं कर पाएगी । हालांकि शहरों में जागरूकता के चलते स्थिति में सुधार आया है ।

      इन सब हालातों से डरने की जरूरत नहीं है, बोलने-चिल्‍लाने की भी सबको जरूरत नहीं है, बस केवल बिरादरी के दस-पांच गाँवों के हजार-पांच सौ लोगों उसके घर पर हमदर्दी के लिए इकट्ठा होने से ही बात बन सकती है । यदि वहाँ भी दबाव न बने, ता थाना-कचहरी में एक बार थोड़े से बदले तेवरों के साथ सभी लोग इकट्ठा होकर जुटने का साहस करोगे, तो तुम्‍हारी बात प्रभावी ढंग से कहने वाला कोई न कोई नेता तो अपने आप मिल जाएगा । इतना जरूर ध्‍यान रखना है कि वह नेता आपके हितों के वितरीत सौदेबाजी न कर पाए । भीड़ के हुजूम को थाना-कचहरी कोई भी नजरअंदाज नहीं कर पाएगा ।

 

दहेज प्रथा -

      रैगर जाति में दहेज की प्रथा बिलकुल नहीं थी, हां, ऐसा करने वालों के बच्‍चों की शादियों में बाधा की संभावना बनी रहती थी, क्‍योंकि लोग ऐसा करने वालों को सम्‍मान की नजर से नहीं देखते थे । सबसे अच्‍छी बात थी कि लड़की जिसके घर पैदा होती थी, उस पर बोझ नहीं बनने दिया जाता था । अब भी कई पुराने लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि लड़की दान करने वाला ही बड़ा होता है । उधर मामा-नाना की ओर से उसका हाथ बंटाया जाता था, इधर लड़के वाला भी दहेज तो कतई मांगता ही नहीं था, बल्कि शादी के खर्चे के तौर पर निकाली जाने वाली पंचायत द्वारा निर्धारित राशि खुशी-खुशी अदा करता था, लेकिन आज के इस आधुनिक युग में दूसरों की देखादेख हमारी जाति में यह बीमारी के रूप में प्रवेश कर गई है, जिससे जाति के गरीब लोगों के लिए लड़की की शादी करना बहुत पीड़ादाई बनता जा रहा है । इस पर लगाम लगाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जो की सख्‍त आवश्‍यकता है ।

 

बाल विवाह -

      बचपन जो एक गीली मिट्टी के घडे के समान होता है इसे जिस रूप में ढाला जाए वो उस रूप में ढल जाता है । जिस उम्र में बच्चे खेलने - कूदते है अगर उस उमर में उनका विवाह करा दिया जाये तो उनका जीवन खराब हो जाता है ! तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नही हो पा रहा है । बालविवाह एक अपराध है, इसकी रोकथाम के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना चाहिए । लोगों को जागरूक होकर इस सामाजिक बुराई को समाप्त करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए । बाल-विवाह करना सन्‍तान के विकास में अवरोध पैदा करना मूर्खता पूर्ण कार्य है । जब लड़के-लड़की युवा हो जायें तथा घर गृहस्‍थी का भार संभालने योग्‍य हो जायें तभी उनका विवाह करना चाहिये । इससे उनका भावी जीवन भी सुखी होगा । कम आयु में विवाह करने से जल्‍दी ही सन्‍तान उत्‍पन्‍न होगी जिससे माता-पिता व सन्‍तान भी अस्‍वस्‍थ्‍य व अशक्‍त ही रहेंगे । बाल विवाह का सबसे बड़ा कारण लिंगभेद और अशिक्षा है साथ ही लड़कियों को कम रुतबा दिया जाना एवं उन्हें आर्थिक बोझ समझना । क्या इसके पीछे आज भी अज्ञानता ही जिमेदार है या फिर धार्मिक, सामाजिक मान्यताएँ और रीति-रिवाज ही इसका मुख्‍य कारण है, कारण चाहे कोई भी हो इसका खामियाजा तो बच्चों को ही भुगतना पड़ता है ! रैगर समाज में शहरों में तो यह प्रथा प्रचलित नहीं पर गांवों में अभी भी समाज के बंधु अपने बच्‍चों की शादी कम उम्र में ही कर देते हैं । लेकिन गोना 17-18 वर्ष पूर्ण होने के पश्‍यात् ही करते हैं । आजकल कानून के डर से इसमें कमी जरूर आई है लेकिन फिर भी इसमें समाज को अपनी भागीदारी निभाते हुए ओर अधिक सुधार लाने की आवश्‍यकता है ।
कभी कभी तो यह भी देखने में आता है कि कम उम्र में बाल विवाह कर दिया जाता है और बाद में जाकर लड़का उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त कर लेता है और फिर वह बड़ा होकर बचपन किये गए विवाह को ठुकरा देता है और अपनी पत्‍नी से तलाक ले लेता है । क्‍योंकि विवाह के पश्‍चात् माँ - बाप कन्‍या को शिक्षा से वंचित कर देते है और उस कन्‍या के लिए जीवन नर्क के समान हो जाता है । जो भी हो इस कुप्रथा का अंत होना बहुत जरूरी है । वैसे हमारे देश में बालविवाह रोकने के लिए कानून मौजूद है । लेकिन कानून के सहारे इसे रोका नहीं जा सकता । बालविवाह एक सामाजिक समस्या है । अत:इसका निदान सामाजिक जागरूकता से ही सम्भव है । सो समाज को आगे आना होगा तथा बालिका शिक्षा को और बढ़ावा देना होगा । आज युवा वर्ग को आगे आकर इसके विरूद्ध आवाज उठानी होगी और अपने परिवार व समाज के लोगों को इस कुप्रथा को खत्‍म करने के लिए जागरूक करना होगा ।

 

 

      निष्‍कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि अपनी ज्‍वलंत समस्‍याओं के समाधान के लिए सक्रिय पहल नहीं करेंगे, तो इतनी बड़ी संख्‍या वाली जाति होने के बावजूद वो सम्‍मान और अधिकार प्राप्‍त नहीं होंगे, जो कम संख्‍या वाली दूसरी जाति के लोग संगठन के बल पर हाशिल कर लेंगे । संगठन के स्‍वरूप के बारे में गुरु रविदास जी ने कहा है -

''सत संगति मिलि रहिए माधउ जैसे मधुप मखीरा''

      गुरु रविदासजी ने इस पद में फरमाया है कि हम ऐसा संगठन बनाएँ, जैसे मधुमक्खियाँ बनाती हैं । वे सब एक दूसरे के साथ एक छोटे से स्‍थान पर साथ-साथ रहती हैं और दुनिया को मधु अर्थात् शहद प्रदान करती हैं, जो बहुत मीठा होता है । वे एक साथ मिलकर जो संगठन (छत्ता) बनाती हैं, उससे मिले भी लोग मधु खाते हैं, क्‍योंकि किसी के छेड़ने पर या तंग करने पर मधुमक्खियां एक साथ अपने दुश्‍मन पर टूट पड़ती हैं, ऐसे ही संगठन आज की स्थिति में कारगर हैं । समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों को दूर करें व प्रगतिशील बातों की ओर ध्‍यान देकर समाज उत्‍थान हेतु उन्‍हें क्रियान्वित करें तभी हमारे समाज की उन्‍नति सम्‍भव है ।

 

 

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