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Swami Moghanatha ji
Swami Moghanatha ji

       परमपिता परमात्‍मा की महान् कृपा से आपका जन्‍म ग्राम आसपुरा, जिला जयपुर, राजस्‍थान में विक्रम सम्‍वत् 1955, में फागुणबदी ''महाशिव रात्रि'' के दिन सांयकाल पाँच - छ: बजे को हुआ था । आपके जन्‍म का नाम ''माधो'' था । आपके पिता का नाम रूढाराम जी परसोया व माता का नाम श्रीमती केसरी देवरी, 'झाडली' ग्राम, गौत्र सौकंरिया की थी । बचपन में ही पिता जी का स्‍वर्गवास होने पर अपके सिर का साया समाप्‍त होने से माता जी ने आपका लालन पालन करने हेतु दिल्‍ली प्रस्‍थान किया । और दिल्‍ली में रैगरों की बस्‍ती थी ''धीरज की पहाड़ी'' सदर थाने के पास में वहां मेहनत मजदूरी करके आपकेा परबस्‍त किया, जब तरूण हुए तो स्‍वयं भी मेहनत मजदूरी करके आपने स्‍वयं अपना विवाह किया । विवाह के बाद आपको एक पुत्र रत्‍न की प्राप्ति हुई परन्‍तु पुत्र के बाल्‍या अवस्‍था पूर्ण होने के पश्‍चात ही वह भगवान को प्‍यारा हो गया । और आपकी धर्म पत्नि का भी स्‍वर्गवास हो गया । यह सब परम परमेश्‍वर को मंजूर था । विधाता के लेख थे । आपका गृहस्‍थाश्रम से रूझान कम हो गया और जब आपका मन सतसंगादि में भाग लेना और भजन वाणियां व सतों के सम्‍पर्ग में आने से आपकी गहरी रूचि हो गई और आपका मन उपराम हो गया । और स्‍वामी करणनाथ जी महाराज के आप शिष्‍य बन गये और उनसे आपने शिक्षा - दीक्षा प्राप्‍त की । आपके दादा गुरू श्री नवल नाथ जी महाराज बीकानेर निवासी थे । आपने भगवाभेष धारण्‍करने के बाद भी महिला साथी का चयन किया जो आपके साथ धर्मप्रीत निभाकर अन्‍त तक साथ रही ।

       आप त्रिवेणी के तट के पास चिमटा गाडकर छप्‍पर की झोपड़ी बनाकर भजन-कीर्तन करने लगे । त्रिवेणी के अन्‍य संतो द्वारा इसको डरा-धमकाकर भगाने की कोशिश की गई, किन्‍तु ये निर्भय होकर धुणों के स्‍थान पर डटे रहे और उस स्‍थान पर गंगा त्रिवेणी का निर्माण करवाया । यह धुणा आज भी निरन्‍तर जगा हुआ है और विराजमान है । स्‍वामीजी ने 22 वर्ष तक समाज के लिए तन-मन-धन से सहयोग किया । इन्‍होंने गंगा माता की मूर्ति के अलावा भगवान कृष्‍ण की मूर्ति स्‍थापित की तीसरी मूर्ति भगवान शिवशंकर की है । इन तीनों मंदिरों के अलावा बाहर चौक में बाबा राम देवजी महाराज की व माता वेष्‍णो देवी सिंह पर विराजमान है । उसी के सामने श्री महावीर हुनमान जी का मंदिर है और इन छ: मूर्तियों के अतिरिक्‍त बगीची में स्‍वामी जी के स्‍टेज के सामने एक मूर्ति श्री हरि भ्रतृहरि महाराज की छत्रों के नीचे आसन है । 9 दिसम्‍बर 1983 को स्‍वामी जी का निर्वाण हो गया । आपको मर्णोपरान्‍त दिल्‍ली विज्ञान भवन में आयोजित हुए पाँचवे अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेन 1986, में भारत के महामहिम राष्‍ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के द्वारा ''रैगर विभुषण'' से सम्‍मानित किया गया ।

 

स्‍वामी माधोनाथ महाराज ने भला जिया उपदेश ।

जग जाहिर कर दिया लेकर भगवा भेष ।।

लेकर भगवां भेष जाति को ऊंचा मान दिया है ।

धन्‍य भाग उन महापुरूषों को जिन्‍होंने सहर्ष दान दिया है ।।

कथनी करनी एक थी आपकी था मन में सच्‍चा वैराग्‍य ।

''त्‍यागमूर्ति'' की पदवी, पाई धन्‍य-धन्‍य आपके भाग्‍य ।।

सब कुछ अपना त्‍याग कर स्‍वयं भी अपने आप समाए ।

श्री त्रिवेणी गंगा मंदिर के दुनिया दर्शन करने आए ।।

जिन्‍दगी ऐसी बना जिन्‍दा रहे दिले शाद तू ।

तू न हो इस दुनिया में तो दुनियां को आए याद तू ।।

 

 

(साभार - श्री त्रिवेणी गंगा मंदिर रैगर धर्मशाला सभा स्‍मारिका)

 

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