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Raigar Community Clothing and Jewelry

 

       पुराने समय में रैगर जाति के लोगों का पहनावा उन के संधर्षमय व अभावपूर्ण जीवन में उन्हें फटेहाल कपड़े पहनने को मजबूर करता था फिर भी इनकी गरीबी व साधारण जिन्दगी में शालीनता स्पष्ट झलकती थी क्योंकि रैगर जाति चमड़ा रंगने का काम करती थी इसलिये पुरूषों के वस्त्रों में रंगत के रंग और बदबू को स्पष्ट देखा जा सकता था । त्यौहार, शादी या किसी खास मौके पर साफ कपड़े पहने जाते थे । राजपूतों के शासन में किसी रैगर पुरूष और महिला को चाँदी के जेवर नहीं पहनने दिया जाता था । महिलायें केवल पीतल के जेवर ही पहन सकती थी । आजादी के बाद में रैगर पुरूष कानों में मुरकियां, लोंग, झाले तथा अंगूठी आदि पहनने लग गये और महिलायें भी चाँदी व सोने के जेवर पहनने लग गई । साधारणतया पुरूष लोग सादा पेचों की पगड़िया ही पहनते थे । धोतियां भी घुटनों तक ही पहनते थे, जिस पर कुर्ता पहना होता था । मूछें नीचे की ओर झुकी हुई हुआ करती थी ।


पुरूषों का पहनावा


       रैगर समाज के पुरूष धोती कमीज पहनते थे । कमीज के बदले ‘बन्ड़ी‘ अथवा ‘अंगरखी‘ पहनने का भी रिवाज़ था । ‘बन्ड़ी‘ में बाकयदा अन्दर की तरफ जेबें होती थी । कई पुरूष सिर पर साफा अथवा पगड़ी पहना करते थे । ‘पगड़ी‘ में कपड़ा काफी ज्यादा लगता था तथा ‘साफे‘ में कपड़ा कम लगता था । ये सूती कपड़े ही हुआ करते थे । कई पुरूष देशी चमड़े की जूती जिसे ‘जोड़ी‘ भी कहा जाता था पहना करते थे । धीरे - धीरे ही चप्पल - जूते पहनने का रिवाज़ आया था । आजादी के बाद के युग में पुरूष वर्ग कानों में सोने की ‘मुर्की‘ और ‘बटन‘ पहना करते थे । कई पुरूष अपनी अंगुली में ‘अगुठी‘ भी पहना करते थे । बाद के समय में कई नवयुवकों में गले में सोने की चेन पहनने लगे ।
       इतिहास के पन्नों को देखा गया तो यह पाया गया कि दिल्ली में एक ऐसा दौर भी आया था जब आर्य समाज रैगर जाति में काफी लोकप्रिय हो गया था । आर्य समाज में विश्वास रखने वाले नवयुवक वर्ग कुर्ता और पायजामा पहनने लगे थे जिसका सनातनी रैगरों ने काफी विरोध किया । इन दोनों के बीच झगड़े भी हुये । सनातनियों द्वारा कुर्ता और पायजामा पहनने वालो का असामाजिक तत्व माना जाता था । बाद के सालों में कुर्ता और पायजामा पहनने का रिवाज़ समाज में स्वीकार हो गया और नवयुवक वर्ग द्वारा सिर पर साफा पहनना भी बन्द हो गया । आजकल तो अन्य नागरिकों की तरह कमीज - पेन्ट, सूट आदि पहना जाता है जो बिल्कुल ठीक है क्योंकि समाज पहनावे में अन्य समाजों से अलग नहीं दिख सकता । आजकल का पहनावा विश्वास और जागृति का प्रतीक है ।


1.1 फैंटा: सिर पर सफेद या पीले रंग का मोटे सूत में रैगर समाज के बुजर्गों द्वारा फैंटा पहना जाता था । फैंटा, साफा और पगड़ी में अन्तर होता है । फैंटा दो हाथ लम्बा होता है । जबकि साफा नौ मीटर लम्बा होता है । पगड़ी प्रायः ऊंची जाति के लोग ही पहना करते थे जो विभिन्न रंगो और प्रकारों जैसे पंचरगी पगड़ी, लहरिया पगड़ी केसरिया पगड़ी आदि की हुआ करती है । सिर पर बांधे गये फैंटे, साफे और पगड़ी से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और जाति का पता लग जाता था । इनको सिर पर पहनने से तत्कालीन राजपुताने में किस क्षेत्र का व्यक्ति है, इसका भी पता पड़ जाता था । पगड़ी के रंग से व्यक्ति की मानसिक स्थिति का भी पता लग जाता था । चमकीली रंग बिरंगी पगड़ी से किसी त्यौहार और अच्छे समय का भी अंदाज लगाया जा सकता था जबकि गहरे रंग जैसे मैरून और खाखी रंग साधारण पहनावे के समय को ही बताती है । खाखी रंग की पगड़ी आमतौर से राजपूत ही पहना करते है । मेवाड़ी पगड़ी को बांधने का तरीका मारवाड़ी पगड़ी से अलग होता था । इसी प्रकार से शेखावाटी क्षेत्र में पगड़ी से अलग किस्म से बांधी जाती थी । रैगर समाज के व्यक्ति प्रायः दो रंग के ही फैंटे पहनते थे अर्थात पीले और सफेद । यह माना जाता था कि जिसके पिता का स्वर्गवास हो गया हैं वह सफेद रंग का और जिसका पिता जीवित है वह पीले रंग का साफा या फैंटा पहना करता था । प्रायः रैगर नवयुवक फैंटा या साफा नही पहनते हैं केवल अधेंड और बुजुर्ग ही अपने सिर पर फैंटा पहना करते है । इसके अलावा रैगर समाज के व्यक्ति को साफा और पगड़ी पहनने की तत्कालीन रियासतों के राजपूत राजाओं और ठिकानेदारों द्वारा मनाही हुआ करती थी ।


1.2 पग, साफा और पगड़ी के प्रकार: वास्तव में पगड़ी पहनने का रिवाज राजपूतों द्वारा प्रारम्भ किया गया था । उदयपुर की उमराव पगड़ी, जयपुर रियासत का शाही साफा, जोधपुर का शाही जसवन्त पेच, सामौद, टोंकी, धोलपुरी, जालोरी ,और मालानी पगड़िया राजस्थान की संस्कृति को बताती है । चन्देरी, लहरिया, मोठड़ा, पंचरगा और सतंरगा से विभिन्न प्रकार की पगड़ियों का पता पड़ता है । जयपुर के शाही परिवार में पाग लफदार और शाहीगढ पाग आज भी प्रसिद्ध पगड़ी है । जोधपुर में दुल्हा शादी के लिये घोड़े पर बैठते समय साफा पहनता है जो 27 फीट लम्बा ओर 41 इंच चौड़ा होता है । जब लडा़ई के लिये योद्वा जाते थे तो उनके साफे को ‘अमशाही साफा‘ कहा जाता था । रैगर समाज के व्यक्तियों को इनको पहनने की राज के द्वारा सख्त मनाही थी परन्तु आज के युग में किसी मेहमान, नेता अथवा विशेष व्यक्ति को पगड़ी या साफा पहनाकर उसका स्वागत किया जाता है ।


1.3 पगड़ी और साफा में अन्तर: पगड़ी और साफा बाधने बहुत अन्तर है । साफा दस गज लम्बा और साफा सवा गज अर्थात 1.25 गज चौड़ा होता है जबकि पगड़ी बीस गज लम्बी और सात इंच चौड़े कपड़े की होती है ।


1.4 पगड़ी की रस्‍म का महत्‍व : रैगर जाति में पगड़ी की रस्‍म उस समय होती है जब किसी व्‍यक्ति के पिता का देहांत हो जाता है ओर उस घर का सबसे बड़ा बेटा परिवार की सारी जिम्‍मेदारियों को निभाने के लिये समाज के सभी व्‍यक्तियों के सम्‍मुख 'पाटे' पर बैठकर अपने रिश्‍तेदारों की ओर से पहनाई गई पगड़ी को अपने सिर पर पहनता है । इस प्रकार की पगड़ी सफेद रंग की ही हुआ करती है । यह पगड़ी की रस्‍म अपने दिवंगत पिता के प्रति आस्‍था, इज्‍जत, व्‍यक्तिगत विश्‍वास और परिवार की जिम्‍मेदारियों को निभाने का फेसला, साहस और आत्मिक शक्ति को प्रदर्शित करता है । यह रस्‍म आज भी रैगर समाज में किसी के पिता के स्‍वर्गवास होने पर निभाई जाती है ।


1.5 धोती : पुराने समय में रैगर समाज के लोग घुंडीदार अंगरखी और धोती पहना करते थे । धोती प्राय: सूती लठ्ठे की हुआ करती है । उस समय निर्धनता थी अत: लम्‍बी पूरी धोती नहीं पहनकर उसके दो टुकड़े कर लिया करते थे । इस प्रकार एक धोती प्राय: तीन-चार फुट की बांधने हेतु हो जाया करती थी । इस प्रकार आम रैगर का अपना जीवन बसर आसानी से हो जाया करता था ।


महिलाओं का पहनावा


       रैगर जाति की महिलाओं की वेशभूषा बड़ी कलामय और रंगीन होती है । ये घेरदार घाघरा पहनती है ओर इस पर लूगड़ी या ओढनी ओढती है । लाल लूगड़ी को पहले 'टूल' भी कहा जाता था । विवाह में लाल उभरते हुए रंगा का 'घाघरा' दिया जाता था । महिलायें 'कब्‍जा' भी पहना करती थी जो मूलत: महिलाओं की कमीज़ ही हुआ करती थी । शरीर पर अंगिया पहनी जाती थी जिसे कांचली भी कहते थे जो केवल स्‍तनों और आधी बाहों को ढकती थी । बाद के वर्षों में लहंगों, ओढनियों, अंगियों तथा कांचलियों को गोटा किनारी लगाकर सजाया जाता रहा है । आजकल रैगर जाति की स्त्रियों व बालिकाओं की वेशभूषा में साड़ियां, सलवार व कमीज़ का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है । पुराने दौर में महिलाओं के कपड़े सूत के और मोटे कपड़े के ही हुआ करते थे । राजस्‍थान में महिलाओं चमड़े पर हाथ से रंग बिरंगें सूत से 'सूअे' द्वारा कढ़ाई की हुई पांव की जूतियां पहना करती थी । वे हाथों में लाख का चूड़ा पहना करती थी । बाद के सालों में शीशे की चूड़ियां भी पहनी जाने लगी ।


रैगर महिलाओं द्वारा शरीर पर गुदवाने की प्रथा (Tatoo Marks):- प्राचीनकाल में शरीर पर गुदवाने की प्रथा रैगर महिलाओं में प्राय: आम हुआ करती थी । यह माना जाता था कि इससे रैगर महिला की सुंदरता में निखार आयेगा और उसका स्‍वास्‍थय भी ठीक रहेगा । यह भी माना जाता था कि शरीर पर गुदवाये गये निशान मृत्‍यु उपरांत भी मौजूद रहते हैं । रैगर महिलायें अपनी हाथ या बाजू पर पति का नाम गुदवाती थी और बार फूल, बिच्‍छू, किसी देवी देवता का चित्र आदि भी बाहों पर गुदवाया करती थी जिससे प्रतीत होता कि यह समाज जनजाति के रूप में भी विकसित हुआ था । पति का नाम गुदवाने से और महिलायें पति के प्रति उनके प्रेम को बताना चाहती थी । बिन्‍दियों का गुच्‍छा कमल और चक्र का प्रतीक माना जाता था । स्‍वास्तिक का चिन्‍ह सूर्य देवता का चिन्‍ह हुआ करता था । वास्‍तव में शरीर पर मांढने गुदवाना अत्‍यंत पीड़ामय हुआ करता था और कई बार तो गुदवाने की पैनी सूई से खून काफी बह जाया करता था । गुदवाने के उपरान्‍त पिसी हुई हल्‍दी लगाई जाती थी ।


मेहन्‍दी लगाने की प्रथा :- रैगर समाज की महिलायें विवाह जैसे शुभ अवसरों पर मेहन्‍दी लगाना कभी नहीं भूलती है । विवाह के अपसर पर दुल्हिन के हाथों पर मेहन्‍दी लगाने की प्रथा बहुत ही आम बात हुआ करती है । मेहन्‍दी में विभिन्‍न डिजायन जैसे 'बीजणी' लहरिया आदि बनाये जाते है । मेहंदी कड़वा चौथ, रक्षा बंधन, तीज आदि त्‍यौहारों पर भी हाथों पर रचाई जाती है । पहले यह मान्‍यता थी कि सोजत जो पाली जिले में है वहां की मेहन्‍दी बहुत अधिक रचती है अत: मेहन्‍दी खरीदने से पहले यह पूछ लिया जाता था कि मेहन्‍दी सोजत की है अथवा नहीं ? पहले माचिस की तीलियों से ही मेहन्‍दी के मांढने, मांढे का चलन था परन्‍तु आजकल प्‍लास्टिक के कोन से मेहन्‍दी के मांढने मांढे जाते है । रैगर महिलाओं मे यह माना जाता था कि जितनी ज्‍यादा मेहन्‍दी हाथों में रचेगी अर्थात काली पड़ जायेगी उससे यह बात साफ हो जायेगी कि उसका पति उसे कितना प्‍यार करता है । मेहन्‍दी लगाने के बाद हाथों पर तेल लगाने के बाद उसे सूर्य की धूप में रखा जाता था जिससे वह गहरी रच जाये । मेहन्‍दी को सुहाग का चिन्‍ह माना जाता है । मेहन्‍दी लगाने की परम्‍परा आज भी समाज की महिलाओं में विद्यमान है ।


रैगर जाति की महिलाओं के गहने:- राजपुताना में राजाओं और ठाकुरों का राज हुआ करता था । रैगर जाति की महिलाओं को सोन या चांदी के जेवर के बदले पीतल के जेवर को पहनने का ही अधिकार था । हाथों में पहने जाने वाले पीतल के गहने को 'कांकणी' कहा जाता था । गरीब महिलायें लाल अथवा हरे रंग के नकली मूंगे जैसे पत्‍थर की 'कंठी' गले में पहना करती थी । आजादी के कई सालों बाद कई गांवों में वे चांदी के हाथ के कड़े, कमर में 'करधनी', गले में कंठी अथवा लम्‍बी 'तगड़ी', पांवों में चांदी की कड़िया पहनने लगी थी । उस दौर में चांदी के जेवन रैगरों की मुख्‍य: सम्‍पत्ति हुआ करती थी क्‍योंकि इनके मौहल्‍ले के मकानों में चमड़े रंगने का कार्य होने के कारण कोई अन्‍य जाति का व्‍यक्ति इनको मकानों को नहीं खरिदा करता था इसलियें चां‍दी के जवरों को बुरे समय में गिरवी रखकर अथवा बेचकर रूपये लिये जा सकते थे । कई महिलायें अपने शरीर के विभिन्‍न भागों पर मांढने, फूल, पति का नाम आदि गुदवाया लिया करती थी जो उनकी सुन्‍दरता को निखारा करता था । 'धनासा' से महिला के हौंठ लाल हो जाया करते थे । दिल्‍ली में रहने के कारण इनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हो गया और रैगर महिलायें सोने और चांदी के आकर्षक जेवर, श्रंगार स्‍वरूप माथे पर बिंदी, आंखों में काजल या सुरमा, हाथों में मेहंदी और हाथों व पांव के नाखुनों पर नेल पालिश लगाने लग गयी । रैगर जाति की महिलाओं के सोहल श्रृंगार के आभूषणों में बंगड़ी, हथफूल, बोरला, रखड़ी, गोखरू, बाजूबन्‍द, कड़े आदि प्रमुख है । रैगर जाति की महिलायें बोरले और लाख की चूड़िया को सुहाग का प्रतीक मानती थी । पुराने दौर में निम्‍नलिखित गहने और जेवर रैगर महिलाओं द्वारा पहने जाते थे :-


1. बोरला: सिर पर ललाट के थोड़े से भाग तक दिखता हुआ सोने अथवा चांदी का 'बोरला' पहना जाता था । सम्‍पन्‍न महिलायें सोने का और गरीब महिलायें चांदी का बोरला पहना करती थी । सोने या चांदी की परत को सांचे में ढालकर गोल आकार में अन्‍दर लाख भर कर इसे बनाया जाता था जो काली डोरी में पिरोकर सिर की चोटी से बांध दिया जाता था । वृद्ध सुहागिन महिलायें छोटा 'बोरला' पहना करती थी जिसे 'बोरली' भी कहा जाता था । बाद के सालों में 'बोरला' के साथ पर 'टीका' पहने जाने लेगा ।
2. लौंग: पहले रैगर बालिकाओं की बायीं तरु की नाक बचपन में ही छिदवा दी जाती थी जिससे वह नाक में 'लौंग' पहन सके । सोने अथवा चांदी की 'नथ' रैगर महिलायें कभी नहीं पहनती थी । दिल्‍ली में रैगर महिलायें रोजमर्रा के जीवन में नाक में जवार के दाने के समान सोने की 'लौंग' पहना करती थी और विवाह और खुशी के अवसरों पर विभिन्‍न प्रकार के जेवर भी पहना करती थी । बाद के सालों में 'लौंग' के डिजाइनों में काफी बदलाव आता रहा । आजकल रैगर महिलायें सोने में मढ़ी हीरे की लौंग पहनती है । भिन्‍न -भिन्‍न किस्‍म की नथ पहनने का प्रचलन भी समय के अनुसार महिलाओं में आ गया है ।
3. 'बाटा', 'बाळी' और 'झूमर' : रैगर बालिकाओं के दोनों कानों के नीचे के भाग को छिदवा कर कानों के गहने पहनाये जाते थे । पहले के समय में कानों में बाळी अथवा 'बाटा' पहना जाता था 'बाटा' सांचे में ढला हुआ गोल हुआ करता था जो सम्‍पन्‍नता के अनुसार सोने या चांदी के हुआ करते थे । आज के 'झूमर' इन्‍हीं का बदला हुआ रूप है । कान में 'टॉप्‍स' भी पहने जाते रहे हैं ।
4. बाळी व लौंगे : कान की लौर अर्थात कान के ऊपर के हिस्‍से में 'बाली' पहनने के लिये कई रैगर महिलायें कान छिदवा लिया करती थी । प्राय: सम्‍पन्‍न परिवार की महिलायें ही सोने की 'बाली' पहना करती थी । आजकल की कई लड़कियां कान के इस भाग को दो या तीन स्‍थानों पर छिदवा कर कान की साइट को लाईन में 'लौंगे' पहनती है ।
5. 'हंसली', 'हमेल', 'तलड़ी', 'कंठी', 'ढौलना' और 'टेवटा' : रैगर महिलाओं द्वारा गले में 'हंसली', 'हमेल', 'तलड़ी', 'कंठी', 'ढौलना' और 'टेवटा' पहना जाता था । 'हंसली' चांद के आकार का काफी भारी जेवर हुआ करता था जिसका डिजाइन इस तरह का होता था कि आगे का भाग थोड़ा मोटा और घड़ाई किया होता था और पीछे का भाग पतला होता था । इसके पीछे के दोनों मुंह मुड़े हुये होते थे जिनमें काला डोरा पिरोकर गले में इसे पहना जाता था । सम्‍पन्‍नता दिखाती हुई पाव भर से लेकर एक सैर वजन तक की चांदी की 'हंसली' रैगर महिलाओं का इच्छित आभूषण होता था । उस समय विक्‍टोरिया और जार्ज पंचम के चांदी के रूपयों का प्रचलन था । हमेल में इन चांदी के रूपयों पर चांदी की ही 'पकड़' लगा दी जाती थी । 'हमेल' को जरी लगे धागों में इस तरह से पिरोया जाता था कि जब यह पहनी जाये तो गले के दोनों तरफ चांदी के सिक्‍के बराबर ही दिखते रहे । 'तलड़ी' गले में पहने जाने वाली वक्ष से नीचे तक लम्‍बी चेन ही हुआ करती थी । प्राय: यह चांदी की ही हुआ करती थी । 'कंठी' सोने की हुआ करती थी । इसके बीच में तीन फूल होते थे । यह सोने के खोखले मोतियों में गुथी होती थी । यह गले के कंठ तक पहनी जाती थी इसीलिये इसे 'कंठी' कहा जाता था । 'ढौलना' प्राय: सोने का ही हुआ करता था । यह गोलाई में लम्‍बे रूप में होता था जिसके भीतर लाख भरी होती थी और इसके दोनों मुहों को सुन्‍दर रूप में मौड़ते हुये इन पर बाजरे के दाने के समान सोने की गोलियां लगाकर बंद किया होता था । यह काले डौरे में पिरोया होता था । 'टेवटा' महिला के परिवार की कहा जाता था । 'सोने का टवटा' गले को लगभग ढक लिया करता था । इसके नीचे के हिस्‍से में सोने के मोतियों की झालर लटकती होती थी और इसके बीच में उभरते हुये गोल फूल खिलते से नजर आते थे तथा ऊपर के हिस्‍से में सोने की कलाकारी की हुई एक परत हुआ करती थी । 'टेवटा' कई तरह के डिजायनों में बनता था । यह छोटे-छोटे हरे रंगों के मोतियों की लड़ियों में पिरोया होने के कारण गले का सुन्‍दर जेवर होता था ।
6. 'बठन' : पहले रैगर महिलाओं द्वारा ब्‍लाऊज के बदले प्राय: ढीला कमीज या कुर्ती पहना जाता था । कमीज पर बटन चांदी या सोने के लगाये जाते थे जो आमतौर से तीन या चार ही हुआ करते थे । ये बटन अलग-अलग रूप से कमीज के काजों पर लगे होते थे और कई बार इन्‍हें चेन में पिरोकर भी कमीज़ पर बटन के रूप में पहना जाता था ।
7. 'बल्‍ले', कड़े बंगडी व कांकण : रैगर महिलाओं में हाथों में कोहनी के ऊपर सोने या चांदी की गहने पहने जाते थे । दो या तीन 'बळ' खाये होने के कारण इसे 'बळा' कहा जाता था । हाथ की कोहनी के नीचे के भाग में 'कड़े', 'बंगड़ी' और 'कांकण' पहने जाते थे । चूड़ियां पहनने के कारण हाथों के बाजू में पहने गये गड़े कड़े घिस जाते थे परन्‍तु बिना 'कड़ो' के पहने कोई रैगर महिला नहीं रहती थी । 'कड़े' प्राय: गोल आकार में होते थे जिनके दोनों मुहों पर डिजाइन बनाये होते थे । 'बंगड़ी' चूड़ियों के बाद में पहनी जाती थी । ये उभरती हुई गोल आकार में होती थी । इनके ऊपर गोल-गोल रूप में कंगारे निकले होते थे जो इसे अलग ही छटा दिया करते थे । इसे बन्‍द करने के लिये घुमाऊ पेज लगे होते थे । 'कांकण' बड़ा ही सुन्‍दर उभरा हुआ रैगर महिलाओं का जेवर होता था । इन गहनों को हाथों में पहनने का तरीका इस प्रकार से था कि पहले 'कड़े', बाद में चूड़िया जो प्राय: लाख की हुआ करती थी, उसके बाद 'बंगड़ी' पहनी जाती थी । 'बंगड़ी' के ऊपर 'कांकण' पहने जाते थे । इस प्रकार हाथ का पूरा श्रृंगार किया जाता था ।
8. 'हथफूल' व 'छल्‍ले' : हाथों की अंगुलियों में 'हथफूल' पहनने के बाद अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थी । अंगूठों में 'छल्‍ले' भी पीने जाते थे । 'छल्‍ले' प्राय: घुमावदार ही हुआ करते थे ।
9. 'कमरबन्‍द' व 'तागड़ी' : कमर में 'कमरबन्‍द' या 'तागड़ी' पहनी जाती थी ।
10. 'गुच्‍छा' : साड़ी या घाघरे पर चांदी में चाबियों का घूंघरूदार गुच्‍छा लगाया जाता था ।
11. 'कड़िया', 'नेवरी', 'छैलकड़ा' और 'टनका' : चांदी की 'कड़िया', 'नेवरी', 'छैलकड़ा' और 'टनका' जैसे सुन्‍दर गहने पांवों में पहने जाते थे । पहले के दौर में विवाहित महिलाओं द्वारा ही वजनी चांदी की 'कड़िया' पहनी जाती थी जिन्‍हें जीवन में एक बार पहनने के बाद इनको आमतौर से नहीं निकाला जाता था ।
12. 'पाजेब', 'बिछिया' व 'छल्‍ले' : पांव में चांदी की पाजेब पहनी जाती थी । इसके अलावा पांव की अंगुलियों में 'बिछियां' तथा पांव के अंगूठे में 'छल्‍ले' पहने जाते थे । चांदी की पाजेब ही पहनने का रिवाज़ होता था । इसका मुख्‍य कारण यह भी हो सकता है कि सोने को पहनने की राजस्‍थान में राजपूतों द्वारा मनाही थी अत: सोने की पाजेब को पहनना अशुभ माना जाता था ।

 

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

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