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bhagatram ji
Sadhiv balakadas ji

       साध्‍वी बालकदास धर्माचार्य का जन्‍म सन् 1929 में श्री हुकमारामजी बांसीवाल के यहाँ माता लाडा देवी के गर्भ से ग्राम खुर्द भानपुर, जमवा रामगढ जिला जयपुर (राजस्‍थान) में हुआ । आपका बचपन का नाम सोनी देवी था । आपका विवाह श्री मंगलारामजी जलथुरिया गांव भावणी जिला जयपुर के साथा हुआ । आपके एक बच्‍चा पैदा हुआ जिसका नाम हरिदयाल है । पुत्र प्राप्ति के छ: माह बाद पति का स्‍वर्गवास हो गया । सोनीबाई पर विपदा का पहाड़ टूट पड़ा । उसके अपने पीहर भानपुर आ गई । एक साल बाद दादी तथा सास का भी देहान्‍त हो गया । उसके बाद सोनी बाई को सांसारिक जीवन से विरक्ति हो गई और गृह त्‍याग दिया । 13 वर्षों तक वह भ्रमण करती रही और भगवान की भक्ति में लीन रही । उसके पश्‍चात् वे संत जीवारामजी महाराज के सम्‍पर्क में आई । उनसे दीक्षा लेकर उनकी शिष्‍या बन गई । दीक्षा समारोह बहुत धूमधाम से सम्‍पन्‍न हुआ । दीक्षा लेने के बाद आप 'साध्‍वी बालकदास' के नाम से प्रसिद्ध हुई ।

       रामदेवरा (रूणिजा) जिला जैसलमेर में प्रति वर्ष लोक देवता बाबा रामदेव का भव्‍य मेला भरता है । मेले में राजस्‍थान ही नहीं बल्कि गुजरात, मध्‍य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्‍ट्र, दिल्‍ली आदि कई प्रान्‍तों से लाखों की संख्‍या में दर्शनार्थी आते हैं । बाबा रामदेव पीर में जितनी श्रद्धा हिन्‍दुओं की है उतनी ही आस्‍था मुसलमानों की भी है । रैगर समाज के भी हजारों लोग प्रतिवर्ष बाबा रामदेव के दर्शनार्थ रामदेवरा आते हैं । रामदेवरा में कई जातियों की अपनी धर्मशालाएँ बनी हुई हैं मगर रैगर समाज कोई धर्मशाला नहीं थी । रामदेवरा (रूणिजा) आज भी एक छोटा-सा गांव है जहाँ अन्‍य बड़े शहरों की तरह ठहरने की कोई सुविधा नहीं है । रामदेवरा रेगिस्‍तान का पिछड़ा ग्रामिण क्षेत्र होने से रैगरों को अन्‍यत्र ठहरने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है । रैगर समाज की इस पीड़ा और दर्द को महसूस किया साध्‍वी बालकदासजी ने । उन्‍होंने बाबा रामदेव के निज मंदिर में आराधना करते हुए संकल्‍प लिया कि मैं मेरा शेष जीवन समाज और समाज सुधार के कार्यों में ही व्‍यतित करूंगी और रामदेवरा में रैगर धर्मशाला बनवा कर समाज को समर्पित करूंगी । इस संकल्‍प को पूरा करने के लिए उन्‍होंने पूरे रैगर समाज में जागृत पैदा की । यह कार्य सम्‍पूर्ण समाज के सहयोग से ही पूरा हो सकता था । साध्‍वी बालकदासजी की निस्‍वार्थ सेवा भावना को देखकर रैगर समाज ने उदार हृदय से दान दिया । बालकदासजी ने रामदेवरा में 100x100 वर्ग फुट का भूखण्‍ड खरीदा । दिनांक 21.04.1983 को रामनवमी के दिन रामदेवरा के सरपंच श्री नरवतसिंहजी के कर-कमलों से रैगर धर्मशाला का शिलान्‍यास करवाया । उनके अथक प्रयासों से 72 कमरों की एक विशाल धर्मशाला रामदेवरा में बनकर तैयार हो गई है । यहाँ यात्रियों के ठहरने की उचित व्‍यवस्‍था है । धर्मशाला परिसर में जीवारामजी महाराज की मूर्ति स्‍थापित की गई है । इस धर्मशाला का उद्घाटन दिनांक 26.08.2001 को श्री छोगाराम बाकोलिया यातायात मंत्री, राजस्‍थान की अध्‍यक्षता में आयोजित एक विशाल समारोह में राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा किया गया ।

       साध्‍वी बालकदासजी की समाज सेवा एवं जनकल्‍याण के कार्यों से प्रभावित होकर श्रीराम जनमण्‍डल, दिल्‍ली ने इन्‍हें 'धर्माचार्य' की उपाधि से सम्‍मानित किया । आपकी अमूल्‍य सेवाओं को देखते हुए अखिल भारतीय रैगर महासभा द्वारा विज्ञान भवन दिल्‍ली में आयोजित पंचम सम्‍मेलन में 27 सितम्‍बर, 1986 को भारत के तात्‍कालीन राष्‍ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह के कर-कमलों से 'श्रेष्‍ठ रैगर महिला सेविका' की उपाधी से अलंकृत किया गया । साध्‍वी बालकदासजी धर्माचार्य का निधन दिनांक 16 जुलाई, 2008 को जयपुर में हो गया । उनकी अंतिम इच्‍छानुसार रामदेवरा में रैगर धर्मशाला परिसर में दिनांक 17 जुलाई, 2008 को राजस्‍थान, दिल्‍ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्‍य प्रदेश एवं महाराष्‍ट्र से आए हजारों भक्‍तों की उपस्थिति में अंतिम संस्‍कार कर दिया गया । रैगर समाज साध्‍वी बालकदास धर्माचार्य की अमूल्‍य सेवाओं को श्रद्धा के साथ हमेशा याद करता रहेगा ।

 

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत 'रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति')

 

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