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दिनांक 13-07-2015

’’मुझे भी, रैगर समाज का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना है’’

 

 

Kushal Raigar

       गत दिनों अपने आपको राष्ट्रीय संस्था के रूप मे प्रचारित करने वाली महासभा के चुनाव सम्पन्न हुए। कहने को तो, राष्ट्रीय स्तर जबकि, वास्तविकता देखे तो, पता चलेगा कि संख्या की दृष्टि से, किसी कस्बे की संस्था लगती है तो आप कहेगे कैसे?
       आप ही देखिये की, भारत देश मे रैगर समाज की आबादी लगभग 35 से 40 लाख है जबकि, अपने आपको राष्ट्रीय स्तर की संस्था बताने वाली की सदस्यता संख्या 2501 ही है। जो दषमलव शून्य एक प्रतिषत से भी कम है।
       अब आप ही बताइये कहने मात्र से ही, कोई राष्ट्रीय नही बन जाता है। संस्था का ढांचा कई मायनो मे अलोकतांत्रिक है, क्योकि समाज की आबादी का आधा हिस्सा महिलायें है जबकि, संस्था के सदस्यो मे महिलाओं व युवाओं की भागीदारी 5 प्रतिषत भी नही है तथा इस तरह से अपने आपको राष्ट्रीय स्तर की संस्था कहना, गैर प्रजातान्त्रिक है।
       जब बात ऐसी संस्थाओ के अध्यक्ष बनने की हो तो, प्रथमदृष्टया आसान लगता है लेकिन वास्तविकता मे बड़ा खर्चीला और मंहगा काम है, आप कहेगे कैसे?
       सबसे पहले आवेदन और उसकी फीस वह भी हजारो मे और फिर उसमे भी 85 पद हो तो, बात लाखो तक पहुचती है। फिर भी यह कोई मुद्दा नही है, क्योकि उक्त राशी महासभा के कोष मे जाती है। जो समाज के विकास मे उपयोग होगी।
       इससे आगे बढे तो पता चलेगा कि, चुनाव मे आवेदन और वोट का निवेदन मात्र से तो, कुछ होना-जाना है नही, क्योकि जितना पिछड़ा समाज है, चाहे वह आरक्षण की लाठी से 3.5 प्रतिषत वर्ग भले ही नोकरीपेषा बन गया हो, लेकिन उनकी स्थिति आज भी, पहले जैसी कंगाल है।
       समाज मे ठेकेदार लोगो ने राजनीति की तरह, इसे भी अपने भष्ट्राचारी कमाई से, इसे भष्ट्र बना दिया है। आप कहेगे कैसे- तो सुनिये।
       जिस तरह राजनैतिक पार्टीया सत्ता को हासिल करने के लिये साम-दाम-दण्ड-भेद का उपयोग कर रही है। ठीक उसी प्रकार समाज की ठेकेदारी हासिल करने के लिए, समाज का सेवानिवृत नोकरषाह वर्ग, साम-दाम-दण्ड-भेद का उपयोग करते हुए समाज की ठेकेदारी हासिल करने मे लग गया है और उसे ऐसा करने के बाद मिल भी जाती है। लेकिन एक बात समझ मे नही आती है कि, राजनीति मे तो जीतने के बाद, नेता, जनता से सारा पैसा, ब्याज सहित वसूल करने की ताकत रखता है और करता भी है।
       लेकिन सामाजिक संस्था मे तो, त्याग के अलावा कुछ हासिल होना है नही, क्योकि इन संस्था के पास अपने अध्यक्ष व पदाधिकारियो को देने के नाम पर, मात्र पद है और कुछ नही। इनकी आय का एकमात्र साधन भी सामाजिक दान है।
       जब सामाजिक संस्थाओ से कुछ हासिल होना है नही, तो यहा अध्यक्ष व अन्य पद मात्र, हासिल करने के लिये इतना पैसा खर्च कर देते है, जितने इन्होने अपने जीवन मे समाज को कभी दान तक नही दिये।
       मतदाताओ से वोट हासिल करने के तथा उन्हे लुभाने के नाम पर ढेर सारी सुविधायें, वी.आई.पी. होटल मे रहना, वी.आई.पी. खाना, गाडि़यो मे घुमना, पोस्टर, बेनर होर्डिग जैसे धुआ-धार प्रचार-प्रसार जैसे कोई राष्ट्रीय सत्ता रूढ पार्टी का प्रचार कर रहे हो और प्रधानमन्त्री बनने की दौड़ लगा रहे हो। जबकि इनकी वास्तविक हैसियत, राजनैतिक गलियारो मे नाममात्र के बराबर भी नही है। आप कहेगे कैसे-
       आपको विदित होना चाहिये कि, देष मे 10 हजार से ज्यादा जातिया विधमान है तो, फिर अध्यक्ष व संगठन तो हजारो होगे ही। राजनीति के गलियारो मे इनके कहने से पत्ता भी नही हिलता है। आपको जानकर आष्चर्य होगा कि, 2,501 सदस्यो वाली महासभा जैसे संगठन मे अध्यक्ष का चुनाव जीतने के लिये प्रयास करे तो, आपको इसकी किमत लाखो रूपये मे चुकानी पड़ेगी। षायद 15 से 20 लाख रूपये।
       एक वोट की लागत करीब आपको 2,000 रूपये आऐगी। सबसे बड़ी बात वोट पाने के लिये, वोट की किमत उम्मीदवार चुकाएगा, तो फिर वह समाज की सेवा क्या खाक करेगा, क्योकि यहा उसकी भूमिका सौदागर की है।
       क्योकी मतदाता की सोच है की, आपकी ईमानदारी अपने घर रखे, वोट चाहिये तो, खाना-पीना, होटलो मे रहने की व्यवस्था करने की हैसियत रखते है तो, फिर आप अध्यक्ष बनने लायक है अन्यथा नही।
       जिस जनता ने वोट के लिये सुख-सुविधाओ के नाम पर किमत वसूल की हो तथा सौदा किया हो, वो अपने चुने जाने वाले प्रतिनिधियो से विकास का हक खो चुकी होती है ओर ऐसा अध्यक्ष अपने विकास के दावो से मुक्त हो जाता है, क्योकि उसने वोट की किमत चुकाई है अर्थात् मुक्त मे नही मिला है।
       ऐसे बिकाऊ समाज के सामाजिक नेता कैसे होगे। आप समझ सकते है। लगता है कि, यह बिकाऊ जनता के खरीददार , नेता है। दोनो ही ग्राहक और दुकानदार की भूमिका मे है। ऐसी स्थिति मे ईमानदार और कर्मठ, समाजसेवी विकासषील नेता की उम्मीद करना बेमानी है और रही-सही कसर सामाजिक पत्रकारो ने पूरी कर दी। विज्ञापनो के नाम पर पूरा-पूरा अखबार ही बुक कर दिया और पूरा ही पेड अखबार बना दिया। जनता के सामने स्पष्ट तस्वीर रखने वाले खुद ही, इस मेले मे खो गये।
सही मायने मे जिनकी जिम्मेवारी समाज को विकास के मार्ग पर ले जाने की होती है, उन्होने ही अपने फायदे के लिये समाज का बेड़ा गरक कर रखा है। संस्थाओ पर कब्जा करने के उदेष्य से संस्था के संघ विधान पत्रो को गैर वैधानिक रूप से संषोधित करते हुए 85 पदो के चुनाव और फिर उसके ऊपर पेनल जैसी फर्जी अवधारणा बना दी । जैसे कोई राजनैतिक पार्टी हो।
      जिसका नतीजा, एक सत्ताधारी गुट और विपक्ष। यदि कोई अन्य अकेला उम्मीदवार मैदान मे आ जाए तो, इन पेनलो के गठजोड़ के सामने, उसकी ईमानदारी-कर्मठता और ज्ञान, हवा के झोके की तरह आया और चला गया, हो जाता है।
      ऐसी स्थिति मे चुनाव मे पेनल के गठजोड़, मे गाजर और मूली, सभी एक ही भाव मे बिकते नजर आते है और फिर उसमे चुनाव अधिकारी द्वारा उत्तर-पुस्तिका साथ ले जाने की परमिषन, चुनाव नही एक तरह से बच्चो का खेल हो गया है।
      लेकिन सभी खुष, जनता वोट देने मे खुष और उम्मीदवार वोट लेने मे खुष। किसी को भी समाज सुधार से लेना-देना नही है। मुझे समझ मे नही आता है कि, ऐसे चुनावो से समाज का क्या भविष्य है। क्योकि जिसकी जनता बिकाऊ हो, उसका नेता भी बिकाऊ ही होता है।
      ऐसे समाज का भला होने वाला नही है, क्योकि जिस गरीब व्यक्ति के उत्थान के लिए संस्थाओ का गठन किया जाता है, वे तो दुकान बन गयी है या कुछ लोगो के लिए सेवानिवृत के बाद टाईम पास का जरिया।
प्रष्न यह उठता है कि, धन-बल के आधार पर चुनाव जीतना समाज को पतन की और ले जा रहा है जो, पैसे वाले लोगो के लिए यह शोकीया काम बन गया है।
      महासभा के चुनाव मे अन्ततः यह निष्कर्ष निकलता है कि, जिस अध्यक्ष ने अपने आपको स्थापित करने के लिए संघ विधान को तहस-नहस किया और गैर-वैधानिक संषोधन किये हो, वह उसी सिस्टम का षिकार हो गया है। अर्थात् वही उसके पतन का कारण बना और आज महासभा ऐसे लोगो के हाथो मे चली गयी है, जिसकी कार्यकारिणी मे आपराधिक प्रवृति, प्रोपर्टी डिलर जिसे कई भू-माफिया के नाम से संबोधित करते है और कई असामाजिक तत्व, इसके पदाधिकारी बन गये है।
      चुनाव मे जिस तरह की फर्जी पेनल की अवधारणा विकसित कि गयी, जो अध्यक्ष की कुर्सी हासिल करने के लिये बनाये गये, गठजोड़ के अलावा, कुछ भी नही है। नतीजा गधे-घोडे़ एक ही भाव मे बिके। अर्थात् अच्छे बुरे का भाव खत्म हो गया ओर इस महाकुम्भ मे समाज के कई सच्चे ईमानदार, कर्मठ, समाजसेवी कार्यकर्ताओ का पता ही नही चला और बिकाऊ मतदाताओ को यह जानने की जरूरत महसूस भी नही हुई। एक पेनल नेतृत्व का नतीजा, उसके नीचे कचरा हो या हीरा, बाढ़ मे, अच्छा हो बुरा कोई बह गया या कोई तीर गया।
      नतीजा समाज सच्चे समाजसेवीओ से महरूम हो गया। और हमारा समाज वापस, उसी चैराहे पर आ खड़ा हो गया, जहा 3 साल पहले खड़ा था।
      इसमे यदि आप सोचे की, मुझे भी, रैगर समाज का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना है तो, आपको भी उपरोक्त अच्छे-बुरे सारे काम करने पड़ेगे जैसे, कोई जीतने के बाद लालबत्ती की गाड़ी मिलने वाली हो और वोट हासिल करने के लिये आपको 1,000 से 2,000 तक किमत भी चुकानी पड़ेगी यदि इतना पैसा आपके पास हो तो, विचार करे और मैदान मे आये और हो सकता है कि शायद आपको भी अध्यक्ष बनने का मौका मिल जाये । लेकिन इतना सब कुछ करने मे आपको 10 से 15 लाख की किमत तो कम से कम चुकानी ही पड़ेगी।
      मुझे नही लगता कि समाज के कर्मठ, ईमानदार और बाबा साहेब कि विचारधारा के अनुयायी, ऐसे सिस्टम मे जाकर इस तरह से साम-दाम-दण्ड-भेद कि राजनीति कर, कुर्सी हासिल करे क्योकि बाबा साहेब स्ंवय तीन चुनाव हार गये, लेकिन उन्होने कभी ऐसे असामाजिक तथा समाज के पतन करने वाले सिस्टम का उपयोग नही किया।
      क्या ऐसी परिस्थितियो से निकलकर चुने गये समाज के लीडर समाज को नई ऊचाईयों पर पहुचा पायेगे, जिसने उसकी किमत चुकाई हो। मुझे तो 100 प्रतिषत संदेह है ओर किसी भी ऐंगल से नही लगता है कि, अब भी कोई अच्छे-अच्छे भाषणो और माला-साफा, सम्मान से ज्यादा कुछ होने वाला है।
      सनद रहे की, समाज बिकाऊ होता है, तो उसका नेता भी बिकाऊ समाज है, क्योकि आज समाज का मार्गदर्षन करने वाले ही समाज की महिलाओ ओर युवाओ के विकास का रास्ता रोके बैठे है और यह परम्परा और व्यापक व्यवस्था के नाम पर हो रहा है।
      एनि वे, मुझे कोई आप नही। मै बोलता नही, लिखता हॅू समाज की आवाज बनकर, यह काम निरन्तर करता रहॅूगा, क्योकि हम बाबा साहेब के अनुयायी है। सुधार निरन्तर प्रक्रिया है हम, इनका हिस्सा रहेगे, सिस्टम मे व्याप्त गन्दगी का हिस्सा रहना, हमारी फितरत मे नही।
      यह सच्चाई है वो भी, रैगर समाज की। जिसका राजनैतिक पतन तो लगभग हो चुका है, लेकिन सामाजिक रूप से भी, पतन जैसे स्थिति मे खड़ा है।
      जिसका आज भी कोई सच्चा, मार्गदर्षक नजर नही आ रहा है। मुझे तो अनाथ लगता है, जिसके मा-बाप अब इस दुनिया मे नही रहे हो।
      यदि समाज को षोषण व मानवीय अधिकार हनन से बचाना है और राजनैतिक प्रतिनिधित्व हासिल करना है तो, बाबा साहेब की विचारधारा का मजबूती से अनुसरण करना होगा। तभी मेरा और आपका और हम सबका विकास हो पायेगा। वैसे जीवन के सेवानिवृत दौर मे कोई व्यक्ति, किसी समाज का, घर-परिवार या देष मे क्रान्तिकारी परिवर्तन करे, ऐसा सम्भव नही और इतिहास भी ऐसे लोगो का साथ नही देता है। इसलिये वही घीसा-पीटा सिस्टम चलने वाला है। केवल इंजन का नाम बदल गया है।

जय भीम जय भारत

 

‘‘रैगर समाज मतदाताओ का आभार’’

 

      गत 12 जुलाई 2015 को अखिल भारतीय रैगर महासभा के चुनाव सम्पन्न हुऐ। मुझे भी लगा कि मैं, समाज के एक पढ़े-लिखे बुद्विजीवी वर्ग का हिस्सा हू। मुझे भी कुछ समाज के लिए करना चाहिये। इसलिए मैने भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की ठानी। सो आवेदन कर दिया, जैसे-जैसे मतदान की तिथि नजदीक आने लगी अन्य प्रत्याक्षीयो का प्रचार, गठजोड़-जोर पकड़ने लगा। क्या पावर या क्या पैसा, सबका धड़ल्ले से उपयोग होने लगा।
       मै तो 4-5 दिन मे ही समझ गया कि, मुझे इनसे मुकाबला करना है और अध्यक्ष बनना है तो, वोट की किमत चुकानी पड़ेगी और कई सामाजिक व गैर सामाजिक लोगो का गठजोड़ व फर्जी पैनल जैसा गठबंधन भी बनना होगा और मतदाताओ को आने-जाने, खाने-पीने, होटल मे रहने, गाड़ी-घोडे़, मीटींगो के पैसे चुकाने होगे। जो प्रति वोट किमत 1,000 रूपये से लगाकर 2,000 रूपये बेठेगी अन्यथा चुपचाप बैठ जाओ।
       मैने तय किया कि मै, सभी से अपने बारे मे जानकारी देते हुए अनुरोध और अपील करूगा की, कि आप मुझे अपना वोट दे और यह बखूबी किया । मतदान के दिन, शाम को मतगणना हुई। मुझे ज्ञात हुआ कि, 2501 मतदाताओ मे से 2070 मतदाताओ ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया और मुझे 28 मत मिले।
       मैं सन्तुष्ट था कि, क्योकि मैने 56000 हजार रूपये खर्च किये तथा मुझे 28 मत मिले, जिसमे 21000 रूपये आवेदन राषी, जो महासभा के कोष मे जमा हुई। जो समाजहीत के काम आयेगी।
       मुझे एक बात ओर जानने का मोका मिला की, चुनाव मे जीतने- हारने वाले उम्मीदवारो ने, अध्यक्ष बनने के लिए इतने, गुना रूपये खर्च कर दिये, जितने उन्होने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल मे समाज को दान नही दिये। जो शर्मनाक है।
       ऐसे लोग समाज को क्या नेतृत्व देगे। किसी भी स्तर से मैं, उक्त ठेकेदारो से सहमत नही हु और ना ही, मेरे पास कालाबाजारी का पैसा है। जो मै, ऐसे ही खर्च कर दू। मैं अपने पैसो व साधनो का उपयोग, बाबा साहेब के मिषन और समाजसेवा मे लगाना चाहूगा। जिससे आने वाली कई पीढ़ीया सुधार जाये।
       मै गत 6 वर्षो से रैगर समाज का एक सक्रीय कार्यकरत हूँ और पाली रैगर समाज के सहयोग से, समाज के लिये ऐतिहासिक कार्य किये है। एक वकील होने के साथ-साथ मैं, डॅा. अम्बेडकर की विचारधारा, समाजषास्त्र, अर्थषास्त्र, कानून, लेखाषास्त्र तथा राजनैतिक षास्त्र की समझ रखता हॅू और सामाजीक व राजनैतिक कई बिन्दुओ पर 500 से अधिक, आलेख लिखे है जो, देश की कई पत्र-पत्रिकाओ व मैगजिन मे प्रकाशित हुऐ है।
       उक्त के अतिरिक्त मैं बाबा साहेब के विचारधारा के प्रचार-प्रसार का कार्य करता हॅू और बाबा साहेब डॅा. अम्बेडकर का अनुयायी हूँ। जो मेरे जीवन की प्राथमिकताओ मे सबसे आगे है। जो मुझे यह नही सिखाती है कि, समाज का नेतृत्व करने के लिए, वोटो की खरीद फरोक्त करना जरूरी है। मैं ऐसा गलत काम नही कर सकता, क्योकि ऐसे बिकाऊ समाज का मै, अध्यक्ष बनकर कौनसा तीर मार लूंगा। जबकि समाज मे कई कर्मठ, ईमानदार लोग है लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है।
       मैं समाज के सभी मतदाताओ का बहुत-बहुत आभारी हॅु, जिन्होने चाहे मुझे वोट दिया या न दिया हो। उन्होने मुझे मेरे, महत्त्व से अवगत कराया। मैं इन पंक्तियो से सहमत हॅू कि ‘‘जब आप सफल होते है तो, दुनिया आपसे रूबरू होती है, और जब आप असफल होते है तो, आप, दुनिया से रूबरू होते है। ’’ मुझे रैगर समाज को जानने का मौका मिला। जो शायद इस चुनाव मे भाग लिए बिना, मेरे लिए सम्भव नही था। मैंने उक्त चुनाव, हारकर भी जीता हॅू। मैने यहा बहुत कुछ सीखा है। जो जीवन के कई पड़ाव, पार करने मे बहुत उपयोगी सिद्व होगा।
       इन्ही शब्दो के साथ पुनः आप सबका आभार और बहुत बहुत धन्यवाद। जय भीम-जय भारत कुशालचन्द्र चैहान एडवोकेट, सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ता।

 

 

 

raigar writerलेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I,

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

 

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