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दिनांक 04-03-2013

‘‘संगठनों में बंटता समाज’’

 

 

Kushal Raigar

       जब समाज के विकास की बात हो और सामाजिक संस्‍थाओं व संगठनों पर चर्चा न हो, ऐसा हो नहीं सकता । आज हम उन्ही संस्थाओं और संगठनों की बात कर रहे हैं । जिनके ऊपर समाज के विकास की जिम्मेदारी है, उन्हीं संस्थाओं के पदाधिकारी समाज का बेड़ा गर्ग कर रहे हैं । यह अलग प्रश्न है कि, इन्होने समाज का कितना विकास किया है । इन संगठनों की गतिविधियों पर नजर डाले तो, यह बहुत साफ नजर आता है कि इनके पदाधिकारी समाज के विकास का ढ़िढोंरा तो, बहुत पीटते हैं, लेकिन विकास कही दिखाई नही देता है । वही ‘‘ढांक के तीन पांत’’ ।

       हमारा उदेश्य केवल आलोचना करना नही है, लेकिन यह सच्चाई है कि जिस प्रकार सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, एक से अधिक पदों पर रहकर समाज की सेवा करने का दिखावा करते हैं और अपने आपको समाजसेवी के रूप मे प्रचारित करते है, जबकि वे अपने कार्यों पर नजर डाले तो शून्य नजर आते हैं ।

       ऐसे लोग समाज सेवा के नाम पर राजनैतिक रोटीया सेंकने का प्रयास कर रहे हैं । ऐसे लोगों की चुनाव के समय तो बाढ़ सी आ जाती है । ऐसी स्थिति मे प्रत्येक पदाधिकारी को अपने मन माफिक पद चाहिये और साथ ही, वे यह भी चाहते है कि, संस्थायें उनकी इच्छानुसार कार्य करे । जब उनकी इच्छा पूरी नही होती है, तो वे बना देते हैं ‘‘एक नया सामाजिक संगठन’’ ।

       नया सामाजिक संगठन बना तो देते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि, संगठन केवल बनाने से ही नही चलते । इन्हे चलाने और सफल बनाने के लिये चाहिये, कड़ा परिश्रम, त्याग, समर्पण, पर्याप्त समय और इससे भी ज्‍यादा जरूरी है उस संगठन में लोगों का विश्वास ।

       नीत-नये संगठन बनाना बहुत आसान है, लेकिन उन्हे चलाना उतना ही मुश्किल । इसके लिये वर्षों की कड़ी मेहनत और बलिदान की आवश्यकता होती है । इन संगठनों को बनाने वाले अवसरवादी लोग केवल अल्पकालीन स्वार्थ पूर्ति के लिये बनाते हैं । स्वार्थ पूर्ति हो या न हो, समाज को तोड़ने या भम्रित करने का कार्य जरूर करते हैं । इससे समाज का नुकसान तो होता ही है, साथ ही समाज का राजनैतिक वजूद भी समाप्त होता है ।

       नीत-नये संगठन बनाने की बीमारी ज्यादातर दलित-आदिवासी समाज मे व्याप्त है, जो इनके पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण है । जिसके लिये ज्यादातर ऐसे अवसरवादी और समाजसेवा की आड़ मे राजनीति करने वाले लोग जिम्मेदार है, जिनका उद्देश्य समाजसेवा की आड़ मे राजनीतिक हीत साधना है । जो आज समाज के ठेकेदार बने बैठे हैं ।

       ऐसे नवनिर्मित संगठनों की सफलता की उम्मीद करना बेमानी है । क्योंकि इनके उद्देश्य मे निर्माता का, स्वार्थ निहित होता है, जिसमे समाज का विकास तो मात्र दिखावा है ।

       अक्सर ऐसी संस्थाओं मे पदाधिकारी, वे लोग होते हैं जिन्हे अपनी वर्तमान संस्थाओं मे, अपना हीत साधने का अवसर नही मिला, इसलिये नये तथाकथित संगठन बनाकर अपना हीत साधने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे अधिकतर समाज का युवा वर्ग भम्रित होता है और समाज की भावी पीढ़ी पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जो समाज के भविष्य के लिये अच्छा संकेत नही है ।

       ऐसे नवनिर्मित संगठनों के पदाधिकारी, समाज की गतिविधियों मे जाते हैं और वर्षों से स्थापित संगठनों के विरोध मे प्रचार-प्रसार करते हैं, जिससे पूरे समाज की बदनामी होती है ओर उनका हीत भी पूरा नही होता है ।

       कही-कही तो ऐसा देखने को मिलता है कि, वर्षों से स्थापित संगठनों, के पदाधिकारी होते हुये भी, नये संगठनों का निर्माण कर, समाज के विरूद्व प्रचार-प्रसार करते हैं । जो समाज की नकारात्मक छवि तो बनाते ही है, साथ ही समाज को कमजोर भी करते हैं । ऐसे पदाधिकारीयों को तुरन्त बर्खास्त किया जाना चाहिये । वे अपना कार्य करें, लेकिन पदों का दुरूपयोग ना करे । यह तो वही बात हो गई कि ‘‘जिस थाली में खाते हैं, उसी मे छेद करते हैं’’

       जो किसी भी मायने मे सही नही है । ऐसे विभिषणों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिये । यह लोग वर्षों से स्थापित संगठनों को कमजोर करने मे लगे है इनका सामूहिक रूप से बहिष्कार किया जाना चाहिये । यदि किसी पदाधिकारी को संस्था से शिकायत है तो इसे दुर करने के लिए लोकतान्त्रिक तरीके को अपना सकता है, लेकिन संस्था के अन्दर रहकर, उसे कमजोर करना किसी भी मायने मे न्यायोचित नही है ।

       यदि कोई व्यक्ति किसी संस्था के महत्वपूर्ण पद पर रहकर, समान उद्देश्य की कोई अन्य संस्था का निर्माण करता है और वर्तमान संस्थाओं के विरूद्व प्रचार-प्रसार करता है तो, यह गैर-कानूनी होने के साथ-साथ गैर सामाजिक भी है ।

       मेरा मानना है कि ऐसे लोग समाज सेवा की कार्य करना चाहते हैं तो, उन्हें पहले से स्थापित संगठनों मे रहकर ही अपना जनाधार बनाना चाहिये, क्योंकि यदि वे पहले से स्थापित संगठनों मे अपना जनाधार नही बना सकते तो, फिर वे नये स्थापित संगठनों को सफल भी नही बना सकते ।

       इतिहास इस बात का गवाह है कि, संगठन की सफलता नेतृत्वकर्ता मे निहित है । सफल व्यक्ति कही भी चला जाये, सफल ही होता है । जितने भी सामाजिक, राजनैतिक संगठन देश-विदेश मे चलते है उनमे भाग लेने वाले लोग, वही रहते हैं, केवल नेतृत्व बदलता है ।

 

raigar writerलेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I,

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

माबाईल नम्‍बर 9414244616

 

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