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समाज का विकास और हमारा दृष्टिकोण

 

 

Kushal Raigarजहां तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का प्रश्न है:-
       वर्तमान परिस्थितियों में इसके लिए ढांचा तैयार करने में कुछ समय चाहिए लेकिन यदि हम तुरन्त करना चाहते है तो हमें अपने आस पास के प्रतिभावान बच्चों को चिन्हित कर उन्हें अच्छे कोचिंग संस्थाओं में कोचिंग दिलानी चाहिए । इसके लिए मेरा मानना है कि एक फण्ड बनाया जाये । जिसमें उन सभी लोगों से अंशदान लिया जायें जो आज अपने अपने क्षेत्रों में सफल है । हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि यह हमारी जिम्मेवारी है ।
इसके लिए अच्छे कोचिंग सेन्टर जो जोधपुर, जयपुर, कोटा में है । उनसे कान्ट्रेक्ट किया जाये ताकि हम कम समय में अच्छे परिणाम हासिल कर पाये ।
      इस सन्दर्भ में हम ऐसा भी कर सकते है कि बच्चों की पूरी फीस फण्ड में से न देकर उन्हें 50 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक रियायत दी जायें । ताकि वह कोचिंग के प्रति गंभीर रहे ।


जहां तक सरकारी नौकरी का प्रश्न है :-
       मेरा मानना है कि हम दलित, पिछड़े, गरीब परिवार से आते है जिसका हमेशा से शोषण होता हुआ आया है । मेरा मानना है कि हमें पुलिस की नौकरी करनी चाहिए और यदि यह संभव ना हो तो हमें न्यायिक सेवा में जाना चाहिए चाहे वो जज बने या रिडर लेकिन हमें जाना इसी क्षेत्र में चाहिए क्योकि यह क्षेत्र ऐसे है कि जो हमारे अधिकारों की अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा करते है तथा हमारे अन्दर आत्मविश्वास पैदा करते है । आज भी दलित समाज के चाहे वो ऑफिसर हो या गरीब व्यक्ति, सभी में कही न कहीं एक असुरक्षा की भावना है और आज भी इस क्षेत्र में हमारे लोग बहुत कम है ।


जहां तक आरक्षण और अधिकारों का प्रश्न है
       आज हम आरक्षण और अधिकारों के हनन कि बात करते है तो हमें उन कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए कि यह हमारे दलित समाज साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है ।
       इस समस्या का मूल कारण यह है कि मेरा मानना है कि आज जिन्हें आरक्षण मिला वो डॉक्टर, इंजीनियर, आई.ए.एस., आर.ए.एस बन रहे है जबकि इस आरक्षण व अधिकारों की सुरक्षा के लिए हमें जज व बुद्धिमान एडवोकेट की आवश्यकता है । इस पर कोई ध्यान नही दे रहा है ।
       आज जिस प्रकार हमारे दलित समाज में बहुत सारे डॉक्टर, इंजीनियर, आई.ए.एस., आर.ए.एस. है उसी प्रकार हमारे पास जज, व बुद्धिमान एडवोकेट नही है । इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए मिशन 72 ने हमारे अधिकारों पर चोट करना प्रारम्भ कर दिया है और आज हम बचाव की मुद्रा आ गये है और स्थिति ऐसी है कि हमारे पास इस युद्ध को लड़ने के लिए जो हथियार (कानून के विद्ववान) होने चाहिए वो आज हमारे पास नही है । आज न्यायपालिका के माध्यम से वे हम पर हमला कर रहे है ।
       मेरा मानना है कि आज जो बच्चे आई.आई.टी., पी.एम.टी., आई.ए.एस., आर.ए.एस. कर रहे है उन्हें न्यायिक सेवा में जाना चाहिए तथा एडवोकेट बनाया जाना चाहिए ताकि कोई भी हमारे अधिकारों का हनन करने से पहले सोचें अन्यथा ऐसा न हो कि जिस आरक्षण से आज हम डॉक्टर, इंजीनियर, आई.ए.एस., आर.ए.एस. बन रहे है वह एक दिन समाप्त न हो जायें ।
       मेरी किसी महानुभाव से बात हुई तो वे कहते है कि आज हमारे एस.सी. व एसटी के एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में पैरवी करने लायक नही है । इस बिन्दु पर मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि जो बच्चे परिक्षाओं में 70-80 प्रतिशत अंक लाते है वे तो आज आई.आई.टी., पी.एम.टी. के द्वारा डॉक्टर, इंजीनियर, आई.ए.एस., आर.ए.एस. बन रहे है और जो बच्चे परिक्षाओं में 40-50 प्रतिशत अंक लाते है वे एलएल.बी. कर एडवोकेट बन रहे है तो ऐसी स्थिति में हमारे एस.सी व एसटी के विद्ववान एडवोकेट व जज कहां से मिलेगें । आप अपने प्रतिभावान बच्चों को कानून की शिक्षा दिलायें उन्हें नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी भेजें तो आपको बुद्धिमान एडवोकेट व जज भी मिलेगें ।
       इस मुद्दे पर मेरा स्पष्ट मत है कि यदि हमें आरक्षण व अधिकारों की लड़ाई लड़नी है तो हमारे पास कानून के विद्ववानों की एक फौज होनी चाहिए अन्यथा हम यह लड़ाई हार जायेगें, क्योंकि लडाई लोगों के भरोसे नहीं लडी जा सकती है । मेरा मानना है कि सैनिक हमारे अपने लोग होने चाहिए ।
       वर्तमान स्थिति में हमारे दलित समाज के सभी कानूनविदों को एकजुट करना चाहिए और उन्हें यह कहना चाहिए कि आप बतायें हमें क्या करना है । जो साधन चाहिए वो हम उपलब्ध करायेंगें । क्योकि यह सारा मामला कानून से संबंधित है ।
       वर्तमान परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट में वाल्मिकी समाज के सेवानिवृत लॉ मिनिस्ट्री में कार्यरत रहे अधिकारी ओ.पी. शुक्ला द्वारा एक पी.आई.एल. (लोक जनहित वाद) लगाया गया है । जिसमें रैगर जाटव, चमार, कोली, जुलाह, माला, माहर, गोनडे, मीना, पासी, धोबी, दुसाद, सहित दस जातियों को क्रीमलेयर बनाने की मांग की गई है । इस केस के संदर्भ में हमारे सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत दलित वकीलों से सम्पर्क साधना चाहिए यदि आवश्यकता हो तो उसमें मुस्लिम एडवोकेट को जोड़ना चाहिए जबकि हमें उच्च वर्ग के एडवोकेट को इग्नोर करना चाहिए । क्योकि उससे हमारे पक्ष की उम्मीद करना बेईमानी है ।
       पदोन्नति आरक्षण के मामले पर हमें सरकार पर हमेशा दबाव बनाये रखना है और उसकी निरन्तर निगरानी की जानी चाहिए अन्यथा ऐसा न हो कि हमारा कोई नुकसान हो जायें । इस पर हमारे स्थानीय एडवोकेट की टीम बनाकर केस पर निगरानी के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इसकी मोनेटरिंग की जानी चाहिए क्योकि ये सारा मामला कानूनी है, प्रशासनिक नही ।
       आज जिस प्रकार हमारे पास डॉक्टर, इंजीनियर, आई.ए.एस., आर.ए.एस. अधिकारी है उसी प्रकार यदि बुद्धिमान अधिवक्ता व जज होते तो शायद आज हमारी ऐसी स्थिति नही होती । हमें इस पर तुरन्त ध्यान देने की आवश्यकता है ।

 

जहां तक राजनैतिक क्षेत्र में भागीदारी का प्रश्न है :-
       मेरा मानना है कि हमारी सभी सामाजिक संस्थाओं को एक मंच पर एकत्रित होने की आवश्यकता है ना कि वे अपना-अपना अलग-अलग अस्तित्व जनता व राजनैतिक पार्टीयों के समाने पेश करें । सभी सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों का दूसरी सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों का आपस में समय-समय पर विचार मंथन होते रहना चाहिए ताकि राजनैतिक पार्टियों पर दबाव बनाया जा सके । हमारे नेतृत्व में आम सहमति होनी चाहिए ताकि हमारी ताकत संगठित रहे ।

       व्यवसायिक दृष्टि से देखा जायें तो आज हमें तथा हमारी नई पीढ़ी को उन क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि जिन क्षेत्रों में आज भी हमारे लोग नही है जैसे चार्टर एकाउन्टेट, कम्पनी सैकेट्री, पेशेवर कम्प्यूटर इंजीनियर, पेशवर सिविल इंजीनियर तथा अनेक पेशेवर व्यवसाय है जिसमें हमारे लोग नही हैं । जो कुछ भी डॉक्टर, इंजीनियर, है वे सभी सरकारी कर्मचारी है ।
छात्र व छात्राओं को आर्थिक सहयोग के बिन्दु पर:-
       मैं कहना चाहूंगा कि आज हम अपने जीवन में कुछ बन पायें है तो हमारा यह प्रथम कर्तव्य है कि हम अपनी भावी पीढ़ी का आर्थिक सहयोग करें क्योकि घर पैसे से चलता है बातों से नही । पैसा क्रय शक्ति है जिससे साधन हासिल किये जा सकते है और हमें अपने आय का कुछ हिस्सा हमेंशा अपने समाज व भावी पीढ़ी के विकास पर खर्च करना चाहिए ।
       यदि हम आज समाज में पैदा होकर इतने काबिल बनने के बाद समाज को कुछ नही देते है तो हमारा इस समाज में पैदा होने या नही होने का कोई अर्थ नही है जबकि समाज से हमने बहुत कुछ पाया है यह हमें कभी नही भुलना चाहिए ।
       मैं एक बात कहना चाहूॅगा कि आज हमारी लिर्डरशिप कमजोर है मेरा मानना है कि इसके पीछे हमारे यहां कानूनविद्वों की कमी है क्योंकि लीडरशिप को सुरक्षा या तो सरकार देती है या कानून, जब हम आरक्षण की बात करेगें तो सरकार हमारा सहयोग कभी नहीं करेगी तो हमें ऐसी स्थिति में कानून के द्वारा ही सुरक्षा हासिल करनी होगी । जिसके लिए हमारे समाज में पर्याप्त मात्रा में कानूनविद्व होने चाहिए ।
       जहां तक मिडीया की बात है मेरा यह मत है कि हम हमारे सामाजिक मीडियों को सर्पोट करना चाहिये तथा उन्हें बढावा देना चाहिए जिससे हमारी यह कमी दूर की जा सकती है ।
       मेरा मानना है कि ऐसी शिक्षा का कोई औचित्य नही है जो अपने अधिकारों की रक्षा न कर सके । अर्थात् हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए ताकि हम अपने अधिकारों की रक्षा कर सके । क्योकि कोई भी व्यक्ति बिना पूर्ण अधिकारों के अपने जीवन में सफल नही हो सकता ।
       आज हमारी नई पीढी को डॉक्टर अम्बेडकर के बारे में तथा उनके द्वारा दलित समाज के विकास में किये गये ऐतिहासिक कार्यो के बारे में बहुत कुछ जानकारी देने की आवश्यकता है क्येाकि वो इन महान कार्यो से आज भी अनभिज्ञ है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि डॉ. अम्बेडकर कानून के महान विद्वान व बेरिस्टर थे तथा हमारे बच्चे भी कानून के महान विद्वान होने चाहिए तभी हमारे अधिकारों की सुरक्षा की जा सकती है ।

 

raigar writerलेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

 

 

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